Tuesday, June 15, 2010
साफ-सफाई
विश्व, खासकर विकासशील देशों के सामने स्वच्छ जल और साफ-सफाई की कमी एक बड़ी चुनौती है। यूनीसेफ के अनुसार, विश्व में जलजनित बीमारियों के कारण हर १५ सेकंड में एक बच्चे की मौत हो रही है। इस स्थिति से बचने के लिए जरूरी है कि स्वच्छ जल संभव हो, तो उबला हुआ पानी का सेवन करें।
अहंकार पतन का कारण
राजा भुवनेश्वर ने अनेक अश्वमेध और वाजपेय यज्ञ कराए थे। उन्हें अहंकार हो गया कि पृथ्वी पर उनसे बड़ा धर्मात्मा और कोई नहीं है। उन्होंने राज्य में घोषणा करा दी कि यज्ञ होम करके ही पूजा-उपासना की जा सकती है। जो इस आज्ञा का पालन नहीं करेगा, उसे दंड दिया जाएगा। राज्य में हरिमित्र नामक एक पहुंचे हुए भक्त रहते थे। एक दिन नदी के तट पर जब वह वीणा पर संकीर्तन कर रहे थे, तो राजा के दूत ने उन्हें देख लिया। उसने राजा से शिकायत कर दी कि एक ब्राह्मण यज्ञ होम करने की जगह मूर्ति के सामने नाच-गाकर भगवान को रिझाने का प्रयास कर रहा है। अहंकार में डूबे राजा ने हरिमित्र को पकड़कर दरबार में बुलवाया और पूछा, ‘तुम वेदों के अनुसार यज्ञ-हवन न करके मनमानि ढंग से कीर्तन द्वारा पूजा क्यों कर रहे हो?’ हरिमित्र का उत्तर था, ‘राजन, मैं वेदशास्त्रों के गूढ़ रहस्यों को नहीं समझ सकता। भगवान की मूर्ति के सामने नाच-गाकर उनके नाम का उच्चारण करने से मुझे परम शांति मिलती है।’ राजा संतुष्ट नहीं हुआ और उसने उन्हें राज्य से निकल जाने का आदेश दिया। कुछ दिनों बाद राजा भुवनेश्वर की मृत्यु हो गई। यमराज ने उनके कर्मों का खाता देखकर उन्हें उल्लू की योनि में भेजने का आदेश दिया। राजा ने सकपकाकर धर्मराज से पूछा, ‘मैंने जीवन में असंख्य अश्वमेध यज्ञ किए हैं। प्रजा को धर्मशास्त्रों के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। ऐसा फिर भला कौन सा पाप है, जो मुझे उल्लू योनि में भेजा जा रहा है?’ धर्मराज ने राजा को हरिमित्र वाली घटना की याद दिलाते हुए बताया, ‘अहंकार और मनमाने व्यवहार के कारण ही तुम्हारे तमाम पुण्य क्षीण हो गए हैं। इसलिए तुम्हें उल्लू योनि में भेजा जा रहा है।’ राजा समझ गया कि अहंकार पतन का कारण अवश्य बनता है
चार प्रमुख तीर्थ
सनातन धर्मावलंबियों के लिए देवभूमि उत्तराखंड के चार प्रमुख तीर्थ - गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रीनाथ और केदारनाथ के कपाट खुलने के साथ ही पावन धामों की वार्षिक यात्रा वैशाख मास यानि मई माह में आरंभ होती है। चार धाम यात्रा के लिए गंगोत्री और यमुनोत्री के कपाट इस वर्ष ग्रीष्म काल के लिए अक्षय तृतीया के पुण्य दिन पर 16 मई को, केदारनाथ के 18 मई तथा बद्रीनाथ के कपाट 19 मई को खुले ! इन चार धामों की यात्रा पहले की तरह दुर्गम नहीं रह गई है। तीर्थयात्री धार्मिक महत्व के अनुसार चार धाम में सबसे पहले यमुनोत्री, गंगोत्री जाते हैं। उसके बाद केदारनाथ और आखिर में बद्रीनाथ की यात्रा का पुण्य लाभ लेते हैं। चार धामों की इस यात्रा में देश-विदेश से लाखों की संख्या में तीर्थयात्री शामिल होते हैं। अब यह यात्रा नौ से दस दिन में ही पूरी हो जाती है। अनेक तीर्थयात्री कुंभ मेले में शामिल होकर चार धाम की यात्रा के लिए कपाट खुलने से पहले ही पहुंच गए। चार धामों की ऊंचाई लगभग ३ हज़ार मीटर है। इन चार धामों की यात्रा की शुरुआत प्रमुख रुप से तीर्थ नगरी हरिद्वार से गंगा स्नान के साथ होती है। यहां से चार धामों की यात्रा का दायरा लगभग १५ सौ किलोमीटर है। सरकारी नियमों के अनुसार चार धाम की यात्रा दस दिन, तीन धाम की यात्रा आठ दिन, दो धाम की यात्रा छ: दिन और एक धाम की यात्रा एक दिन में पूरी हो जाना चाहिए। हालांकि वर्तमान में टिहरी बांध के निर्माण के बाद से यमुनोत्री और गंगोत्री धाम की दूरी लगभग २० से २५ किलोमीटर ज्यादा हुई है। किंतु पूर्व की तुलना में यमुनोत्री तक पहुंचने का सड़क मार्ग अब लगभग १० किलोमीटर कम हो गया है। पहले जहां बस या निजी वाहन हनुमान चट्टी तक ही पहुंच पाते थे, किंतु सड़क निर्माण के बाद यह जानकी चट्टी तक चले जाते हैं। जिससे अब यात्रा में अब लगभग चार या पांच किलोमीटर ही पैदल चलना होता है, जो पूर्व मे लगभग १५ किलोमीटर तक पैदल मार्ग था। इसके कारण चार धाम की यात्रा में भी एक या दो दिन की बचत हो जाती है। गंगोत्री तक भी सड़क मार्ग बना है। केदारनाथ की यात्रा की शुरुआत गौरीकुंड से होती है। यह यात्रा लगभग १५ से २० किलोमीटर की पैदल यात्रा है। बद्रीनाथ धाम की यात्रा तुलनात्मक रुप से सुविधाजनक है। प्रशासनिक स्तर पर चार धाम यात्रा में तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए हर स्तर पर अच्छी व्यवस्था की जाती है। प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए भी आपातकालीन सुरक्षा इंतजाम किए जाते हैं। यात्रियों को सभी मूलभूत सुविधाएं जैसे आवागमन, वाहन व्यवस्था, रहने, ठहरने, खान-पान, जल, चिकित्सा, नित्यकर्मों के लिए सुलभ स्थानों की पूरी व्यवस्था सरकार और स्थानीय धार्मिक सेवा संस्थाओं की ओर से की जाती है। विशेषकर महिलाओं, बच्चों और बुजूर्गों की सुविधा का विशेष ध्यान रखा जाता है। अधिक मास के कारण इस वर्ष यह तीर्थ यात्रा घटकर पांच माहों की रह गई है। चार धाम यात्रा के लिए हरिद्वार पहुंचने के लिए भारत के सभी प्रमुख शहरों से रेल, सड़क, वायु मार्ग से आवागमन के साधन उपलब्ध है।
Monday, June 14, 2010
प्रजा कल्याण
सुरथ मनु धर्मात्मा राजा थे। प्रजा को किसी प्रकार का कष्ट न हो, इसका वह विशेष ध्यान रखते थे। मेधा ऋषि से उन्होंने दीक्षा ली थी। गुरु ने उन्हें अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखने का उपदेश दिया। एक दिन किसी सलाहकार ने उनसे कहा, ‘राजा को प्रतिवर्ष अपने राज्य का विस्तार करते रहना चाहिए।’ सलाहकार की बातों ने राजा सुरथ के मन में राज्य विस्तार की आकांक्षा जगा दी। उन्होंने आसपास के अनेक राज्यों को अपने राज्य में मिला लिया। इस सफलता ने उनमें चक्रवर्ती सम्राट बनने की लालसा पैदा कर दी। एक बार उन्होंने सेना में वृद्धि कर कोवा विधवंशी नामक राजा पर आक्रमण कर दिया। पर उस राज्य के सैनिकों ने सुरथ की विशाल सेना का संहार कर दिया। सुरथ मनु इस हार से अत्यंत निराश हो गए। एक दिन वह मेधा ऋषि के आश्रम में पहुंचे और उनके चरणों में गिरकर बोले, ‘गुरुदेव, असीमित इच्छाओं के कारण मैं कहीं का न रहा। मैं साधु बनकर आपके चरणों में जीवन बिताना चाहता हूं।’ गुरु ने कहा, ‘मैंने कहा था कि आकांक्षाएं सीमित रखनी चाहिए। राज-मद को पास नहीं फटकने देना चाहिए। तुमने मेरे वचनों का पालन नहीं किया। इसी से तुम्हारी यह दशा हुई है। अब धैर्य रखो।’ गुरु के शब्दों से उनकी निराशा दूर हुई। कुछ समय बाद उन्होंने अपना राज्य फिर से वापस पा लिया। उसके बाद तो सुरथ किसी भी प्रकार की आकांक्षा और मद से दूर रहकर प्रजा कल्याण में लगे रहे।
Wednesday, June 9, 2010
असल खुशी
पेरिस स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के एक अध्ययन में पता चला है कि दूसरों से अपनी आमदनी का मुकाबला करने वाले लोग खुश नहीं रहते। अपने सहयोगियों या रिश्तेदारों का वेतन आंकने के बाद ऐसे लोग खुद को कमतर समझने लगते हैं और जल्दी ही अवसाद ग्रस्त हो जाते हैं। इसलिए आमदनी की तुलना से बचें।
Saturday, May 22, 2010
साधु के लक्षण
संत कबीरदास धर्म के नाम पर पाखंड करने वालों से बचकर रहने की प्रेरणा दिया करते थे। काशी के गंगातट पर वह किसी साधुवेशधारी को नशा करते या अमर्यादित आचरण करते देखते, तो उसे इन पाप कर्मों से बचने का सुझाव देते। एक बार किसी श्रद्धालु ने कबीर से पूछा, ‘साधु के लक्षण क्या होते हैं?’ उन्होंने तपाक से कहा, साधु सोई जानिए, चले साधु की चाल। परमारथ राता रहै, बोलै वचन रसाल। यानी संत उसी को जानो, जिसके आचरण संत की तरह शुद्ध हैं। जो परोपकार-परमार्थ में लगा हो और सबसे मीठे वचन बोलता हो। कबीरदास ने अपनी साखी में लिखा, ‘संत उन्हीं को जानो, जिन्होंने आशा, मोह, माया, मान, हर्ष, शोक और परनिंदा का त्याग कर दिया हो। सच्चे संतजन अपने मान-अपमान पर ध्यान नहीं देते। दूसरे से प्रेम करते हैं और उसका आदर भी करते हैं।’ उनका मानना था कि यदि साधु एक जगह ही रहने लगेगा,
तो वह मोह-माया से नहीं बच सकता। इसलिए उन्होंने लिखा, बहता पानी निरमला- बंदा गंदा होय। साधुजन रमता भला- दाग न लागै कोय। संत कबीरदास जानते थे कि ऐसा समय आएगा, जब सच्चे संतों की बात न मानकर लोग दुर्व्यसनियों की पूजा करेंगे। इसलिए उन्होंने लिखा था, यह कलियुग आयो अबै, साधु न मानै कोय। कामी, क्रोधी, मसखरा, तिनकी पूजा होय। आज कबीर की वाणी सच्ची साबित हो रही है तथा संत वेशधारी अनेक बाबा घृणित आरोपों में घिरे हैं।
तो वह मोह-माया से नहीं बच सकता। इसलिए उन्होंने लिखा, बहता पानी निरमला- बंदा गंदा होय। साधुजन रमता भला- दाग न लागै कोय। संत कबीरदास जानते थे कि ऐसा समय आएगा, जब सच्चे संतों की बात न मानकर लोग दुर्व्यसनियों की पूजा करेंगे। इसलिए उन्होंने लिखा था, यह कलियुग आयो अबै, साधु न मानै कोय। कामी, क्रोधी, मसखरा, तिनकी पूजा होय। आज कबीर की वाणी सच्ची साबित हो रही है तथा संत वेशधारी अनेक बाबा घृणित आरोपों में घिरे हैं।
Sunday, May 16, 2010
स्वच्छ जल
दुनिया में इनसान की जीवन प्रत्याशा बढ़कर औसतन ६६ वर्ष हो गई है, जो १९६० की औसत दर से २० वर्ष अधिक है। इसी तरह, पिछले ३० वर्षों में बाल मृत्यु-दर भी आधी हुई है। पर आज भी विश्व के एक अरब ३० करोड़ लोगों को पीने का साफ पानी नहीं मिल पाता। ऐसे में, स्वच्छ जल की हर बूंद की कीमत समझिए।
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