महर्षि व्यास के पुत्र शुकदेव ने किसी विद्वान से ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त की। पिता ने उन्हें राजा जनक के पास भेज दिया। शुकदेव जी महाराज जनक के राजमहल पहुंचे। उन्हें लगा कि प्रचुर ऐश्वर्य से घिरे जनक क्या उपदेश देंगे? वह निराश होकर लौटने ही वाले थे कि जनक जी ने उन्हें बुलवाया और कहा, ‘धर्मचर्चा सत्संग भवन में करेंगे।’ सत्संग भवन पहुंचकर उन्होंने शुकदेव से आत्मा-परमात्मा संबंधी बातचीत शुरू कर दी। अचानक कुछ राज कर्मचारी हांफते हुए वहां पहुंचे और सूचना दी कि महल के एक कक्ष में आग लग गई है। राजा जनक ने शांत भाव से उत्तर दिया, ‘मैं इस समय मुनि के साथ ईश्वर संबंधी चिंतन में लीन हूं। आग से बचाव का प्रयास करो। सांसारिक संपत्ति नष्ट होती हो, तो हो जाने दो।’ देखते-देखते आग सत्संग भवन तक पहुंच गई। राजा जनक पास आती आग देखकर भी बेचैन नहीं हुए, किंतु शुकदेव अपनी पुस्तकें उठाकर उस कक्ष से बाहर निकल आए। उन्होंने देखा कि राजा जनक को न तो अपनी संपत्ति नष्ट होने की चिंता थी और न ही किसी के जलकर मरने की। वह निश्चिंत होकर ईश्वर चिंतन में लगे रहे। कुछ देर बाद महाराज जनक ने शुकदेव जी से कहा, ‘दुख का मूल संपत्ति नहीं, संपत्ति से आसक्ति है। संसार में हमें केवल वस्तुओं के उपयोग का अधिकार दिया गया है। अक्षय संपत्ति के स्वामी और निर्धन, दोनों को मृत्यु के समय सब कुछ यहीं छोड़कर जाना होता है। इसलिए नाशवान धन-संपत्ति के प्रति अधिक आसक्ति अधर्म है।’
Saturday, June 26, 2010
Friday, June 25, 2010
हस्त दर्शन
एक ऋषि अपने छात्रों को वेदों का अध्ययन करा रहे थे। उन्होंने ऋग्वेद के एक मंत्र अयं मे हस्तो भगवानयं में भगवत्तरः, अयं मे विश्वभेषजोडयं शिवाभिमर्शनः का अर्थ समझाया जिसका अर्थ था यह मेरा हाथ भगवान अर्थात ऐश्वर्यशाली है। यह अत्यंत भाग्यशाली है। यह दुनिया के सभी रोगों का चिकित्सक है। यह कल्याणकारी स्पर्शवाला है। ऋषि ने कहा इस संदेश का अर्थ यही है कि हाथों से श्रम या पुरुषार्थ करने वाला सदैव सुखी, प्रसन्न तथा स्वस्थ रहता है। वैसे तो मानव शरीर का प्रत्येक अंग महत्वपूर्ण है, किंतु कर्म और पुरुषार्थ में हाथों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। हाथों से निरंतर काम करते रहकर वैभवशाली बना जा सकता है। जबकि हाथों पर हाथ धरे बैठा व्यक्ति निठल्ला कहलाता है। जब हम अपने हाथों से श्रम करते हैं, तब रोग स्वतः दूर रहने को मजबूर हो जाते हैं।’ स्वामी के पास एक व्यक्ति पहुंचा। उसके चेहरे पर निराशा देखकर स्वामी जी ने इसका कारन पूछा ? उसने कहा, ‘धन की कमी के कारण परेशान हूं। मैं अपने को सबसे बड़ा अभागा मानने लगा हूं।’ स्वामी जी ने उसका हाथ अपने हाथ में लिया और बोले, ‘अरे मूर्ख, इन दो हाथों के होते हुए भी अभागे कैसे हो? इनकी मुट्ठियों में तो तुम्हारा भाग्य है। निराशा त्यागो और इन हाथों से श्रम करो, ऐश्वर्य स्वयं तुम्हारे पास दौड़ा आएगा।’ यदि कोई महिला स्वादिष्ट भोजन बनाती है, तो कहा जाता है कि उसके हाथों में जादू है। कोई चिकित्सक रोगियों को स्वस्थ कर देता है, तो कहा ही जाता है कि उस डॉक्टर के हाथ की शफा है। अगर कोई सच्चा संत सिर पर हाथ रख दे, तो कहा जाता है कि हाथ के स्पर्श से अपूर्व शांति मिली है। भारतीय परंपरा में इसलिए तो सवेरे शैया से उठकर सर्वप्रथम हस्त दर्शन करने को शुभ माना गया है।
Wednesday, June 23, 2010
ईश्वर की कृपा
सेठ जमनालाल बजाज ने आजीवन स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग संकल्प लिया था ! एक प्रतिज्ञा यह भी थी कि वह प्रतिदिन किसी-न-किसी संत-महात्मा या विद्वान का सत्संग करेंगे। वह एक दिन संत का सत्संग करने पहुंचे। इस दौरान उन्होंने कहा, ‘महाराज, आप जैसे संतों के आशीर्वाद से मैंने अपने जीवन में आय के इतने साधन अर्जित कर लिए हैं कि मेरी सात पीढ़ियों को कमाने की चिंता नहीं करनी पड़ेगी। कभी-कभी मुझे आठवीं पीढ़ी की चिंता होती है कि उसके भाग्य में पता नहीं, क्या होगा?’ संत जी ने कहा, ‘सेठ जी, आप चिंता न करें। कल आप यहां आ जाएं। सभी चिंताओं का समाधान हो जाएगा।’ सेठ जमनालाल बजाज अगली सुबह-सुबह उनकी कुटिया पर जा पहुंचे। संत ने कहा गांव के मंदिर के पास झाड़ू बनाने वाला एक गरीब परिवार झोपड़पट्टी में रहता है। उसे एक दिन के भोजन के लिए दाल-आटा दे आओ। सेठ आटा-दाल लेकर उस झोंपड़ी पर पहुंचे। दरवाजे पर आवाज देते ही एक वृद्धा निकलकर बाहर आई। सेठ जी ने उसे लाया हुआ सामान थमाया, तो वह बोली, ‘बेटा, इसे वापस लेकर जा। आज का दाना-पानी तो आ गया है।’ जमनालाल जी ने कहा, ‘तो कल के लिए इसे रख लो।’ वृद्धा बोली, ‘जब ईश्वर ने आज का इंतजाम कर दिया है, तो कल का भी वह अवश्य करेगा। आप इसे किसी जरूरतमंद को दे देना।’ वृद्धा के शब्द सुनकर सेठ जमनालाल बजाज पानी-पानी हो गए। उन्होंने विरक्ति और त्याग की मूर्ति उस वृद्धा के चरण छूकर आशीर्वाद मांगा और वापस हो गए। इस घटना के बाद वह स्वयं कहा करते थे ‘कर्म करते रहो ईश्वर की कृपा से आवश्यकताओं की पूर्ति अपने आप होती रहेगी।
Tuesday, June 22, 2010
विनम्रता और दया
सत्संग के लिए आने वालों से संत कबीर अकसर कहा करते थे कि अपने काम को पूरी लगन से करते हुए भगवान का चिंतन करते रहना चाहिए। एक दिन एक श्रद्धालु कबीर के दर्शन के लिए आया। उसने उनसे कहा, ‘बाबा आप तो दिन भर बैठे करघे पर कपड़ा बुनते रहते हैं। फिर भला भगवान का ध्यान-स्मरण कब कर लेते हैं?’ कबीर उसे अपने साथ लेकर गंगा तट पर पहुंचे। एक महिला गंगाजल से भरा गागर अपने सिर पर रखे लौट रही थी। गागर को उसने पूरी तरह छोड़ रखा था और मुंह से गंगा की महिमा के गीत गुनगुना रही थी। लेकिन गागर से एक बूंद भी गंगाजल नहीं छलक रहा था। कबीर उसकी तरफ इशारा करते हुए बोले, इस महिला को ध्यान से देखो। यह मुंह से गंगा का- भगवान का स्मरण कर रही है और इसे यह भी पूरा ध्यान है कि गागर गिर न पाए। दोनों काम एक साथ साधना इस महिला से सीखो। मैं भी हाथों से करघा चलाता हूं, और ऐसा करते हुए मुख से राम नाम जपता रहता हूं। परमात्मा का नाम तो हर क्षण भक्त के हृदय व मन में रमते रहना चाहिए।’ कबीर के इस उपदेश से जिज्ञासु की समस्या का समाधान हो गया। संत कबीर धर्म के नाम पर पनपने वाले आडंबर के घनघोर विरोधी थे। उन्होंने अपनी साखियों में अभिमान में अंधे, ढोंगी-नशेड़ी साधुओं पर काफी कठोर लहजे में प्रहार किए थे। अपने को चमत्कारी साधु या गुरु बताने वाले अहंकारी साधुओं पर उन्होंने लिखा, घर-घर मंतर देत फिरत हैं, महिमा के अभिमाना/ गुरु सहित शिष्य सब बूड़ें, अंत काल पछताना। कबीरदास का मत था कि वही साधु-महात्मा सच्चा गुरु कहलाने का अधिकारी है, जो स्वयं सदाचारी, संयमी और ज्ञानी है। जिसके मन में विनम्रता और दया का वास नहीं है, वह आखिर गुरु कैसे हो सकता है।
Monday, June 21, 2010
परम संतोष
धृतराष्ट्र समय-समय पर महात्मा विदुर के सत्संग के लिए लालायित रहा करते थे। वह जानते थे कि विदुर जो सलाह देते हैं, वह पूर्णतया धर्मसम्मत होती है। वह उनके कटु लगने वाले वचनों को भी कल्याणकारक मानते थे। एक दिन विदुर जी ने धृतराष्ट्र को उपदेश देते हुए कहा, ‘राजन, केवल धर्म ही कल्याणकारक है। एकमात्र क्षमा ही शांति का सर्वश्रेष्ठ उपाय है। विद्या ही परम संतोष देने वाली है। काम, क्रोध और लोभ, मनुष्य के पुण्य का नाश करने वाले नरक के तीन दरवाजे हैं। अतः हर हाल में इनका त्याग करना चाहिए।’ जब उन्होंने देखा कि धृतराष्ट्र पुत्रमोह में सत्य की अवहेलना कर रहे हैं, तो विदुर जी ने कहा, ‘जैसे नदी के पार जाने के लिए नाव ही एकमात्र साधन है, उसी प्रकार स्वर्ग के लिए सत्य ही एकमात्र सोपान है।’ विदुर जी जानते थे कि मोह के कारण ही धृतराष्ट्र पतन को प्राप्त होंगे। इसलिए वह उनसे अकसर कहते, ‘जैसे सूखी लकड़ी में मिल जाने से गीली लकड़ी भी जल जाती है, ठीक उसी तरह दुष्टों का त्याग न करने और उनके साथ मिले रहने से निरपराध सज्जनों को भी दंड भोगना पड़ता है, इसलिए दुर्व्यसनी एवं अहंकारी का साथ तुरंत त्याग देना चाहिए। किसी के मोह में पड़कर दूसरे के साथ अन्याय घोर अधर्म है। आप कौरवों और पांडवों के साथ समान रूप से कोमलता का व्यवहार कीजिए। ऐसा करने से आपको इस लोक में सुयश तो प्राप्त होगा ही, मृत्यु के बाद स्वर्गलोक की प्राप्ति होगी।’ विदुर को श्रीकृष्ण का पूर्ण आशीर्वाद प्राप्त था। भगवान श्रीकृष्ण भी उनकी धर्मपरायणता तथा भक्ति भावना के कायल थे।
Sunday, June 20, 2010
विनम्रता
शिक्षाविद और राजनेता डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी 1952 में भगवान बुद्ध के दो प्रधान शिष्यों सारिपुत्त और महमोग्गलामने के पवित्र भस्मावशेष लेकर म्यांमार गए थे। उसके बाद कंबोडिया के बौद्ध धर्मावलंबियों ने उन्हें अपने देश में आमंत्रित किया। कंबोडिया की राजधानी नॉमपेन्ह में आयोजित बौद्ध महासम्मेलन में उन्होंने कहा, ‘भगवान बुद्ध सनातन धर्मियों द्वारा दशावतार के रूप में पूजे जाते हैं। धर्म के नाम पर प्रचलित ऊंच-नीच की कुप्रवृत्ति के उन्मूलन में उनका योगदान सराहनीय है। उनके इस ऋण से हम कभी उऋण नहीं हो सकते।’ बौद्ध धर्म व दर्शन पर उनका भाषण सुनकर सभी प्रभावित हुए। सम्मेलन में उपस्थित कंबोडिया के एक बौद्ध लामा डॉ. मुखर्जी की श्रद्धा-भावना देखकर भाव-विह्वल हो उठे। वह मुखर्जी के पास पहुंचे और यह कहकर उनके पैरों की ओर झुके कि आप हमारे भगवान बुद्ध की पावन जन्मभूमि में जन्मे हैं, इसलिए हमारे लिए श्रद्धा भाजन हैं। इस पर मुखर्जी ने उन्हें रोकते हुए कहा, ‘आप भिक्षु हैं और हमारी संस्कृति में साधु-संतों के चरण स्पर्श करने की परंपरा है।’ यह कहते-कहते वह तुरंत उनके चरणों में झुक गए। डॉ. मुखर्जी जैसे अग्रणी नेता की इस विनम्रता को देखकर सभी हतप्रभ रह गए। डॉ. मुखर्जी परम धार्मिक व्यक्ति और विनम्रता की मूर्ति थे। 23 जून, 1953 को श्रीनगर में नजरबंदी के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। नजरबंदी काल में भी प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती का पाठ करने के बाद ही वह अन्न-जल ग्रहण करते थे
Tuesday, June 15, 2010
साफ-सफाई
विश्व, खासकर विकासशील देशों के सामने स्वच्छ जल और साफ-सफाई की कमी एक बड़ी चुनौती है। यूनीसेफ के अनुसार, विश्व में जलजनित बीमारियों के कारण हर १५ सेकंड में एक बच्चे की मौत हो रही है। इस स्थिति से बचने के लिए जरूरी है कि स्वच्छ जल संभव हो, तो उबला हुआ पानी का सेवन करें।
अहंकार पतन का कारण
राजा भुवनेश्वर ने अनेक अश्वमेध और वाजपेय यज्ञ कराए थे। उन्हें अहंकार हो गया कि पृथ्वी पर उनसे बड़ा धर्मात्मा और कोई नहीं है। उन्होंने राज्य में घोषणा करा दी कि यज्ञ होम करके ही पूजा-उपासना की जा सकती है। जो इस आज्ञा का पालन नहीं करेगा, उसे दंड दिया जाएगा। राज्य में हरिमित्र नामक एक पहुंचे हुए भक्त रहते थे। एक दिन नदी के तट पर जब वह वीणा पर संकीर्तन कर रहे थे, तो राजा के दूत ने उन्हें देख लिया। उसने राजा से शिकायत कर दी कि एक ब्राह्मण यज्ञ होम करने की जगह मूर्ति के सामने नाच-गाकर भगवान को रिझाने का प्रयास कर रहा है। अहंकार में डूबे राजा ने हरिमित्र को पकड़कर दरबार में बुलवाया और पूछा, ‘तुम वेदों के अनुसार यज्ञ-हवन न करके मनमानि ढंग से कीर्तन द्वारा पूजा क्यों कर रहे हो?’ हरिमित्र का उत्तर था, ‘राजन, मैं वेदशास्त्रों के गूढ़ रहस्यों को नहीं समझ सकता। भगवान की मूर्ति के सामने नाच-गाकर उनके नाम का उच्चारण करने से मुझे परम शांति मिलती है।’ राजा संतुष्ट नहीं हुआ और उसने उन्हें राज्य से निकल जाने का आदेश दिया। कुछ दिनों बाद राजा भुवनेश्वर की मृत्यु हो गई। यमराज ने उनके कर्मों का खाता देखकर उन्हें उल्लू की योनि में भेजने का आदेश दिया। राजा ने सकपकाकर धर्मराज से पूछा, ‘मैंने जीवन में असंख्य अश्वमेध यज्ञ किए हैं। प्रजा को धर्मशास्त्रों के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। ऐसा फिर भला कौन सा पाप है, जो मुझे उल्लू योनि में भेजा जा रहा है?’ धर्मराज ने राजा को हरिमित्र वाली घटना की याद दिलाते हुए बताया, ‘अहंकार और मनमाने व्यवहार के कारण ही तुम्हारे तमाम पुण्य क्षीण हो गए हैं। इसलिए तुम्हें उल्लू योनि में भेजा जा रहा है।’ राजा समझ गया कि अहंकार पतन का कारण अवश्य बनता है
चार प्रमुख तीर्थ
सनातन धर्मावलंबियों के लिए देवभूमि उत्तराखंड के चार प्रमुख तीर्थ - गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रीनाथ और केदारनाथ के कपाट खुलने के साथ ही पावन धामों की वार्षिक यात्रा वैशाख मास यानि मई माह में आरंभ होती है। चार धाम यात्रा के लिए गंगोत्री और यमुनोत्री के कपाट इस वर्ष ग्रीष्म काल के लिए अक्षय तृतीया के पुण्य दिन पर 16 मई को, केदारनाथ के 18 मई तथा बद्रीनाथ के कपाट 19 मई को खुले ! इन चार धामों की यात्रा पहले की तरह दुर्गम नहीं रह गई है। तीर्थयात्री धार्मिक महत्व के अनुसार चार धाम में सबसे पहले यमुनोत्री, गंगोत्री जाते हैं। उसके बाद केदारनाथ और आखिर में बद्रीनाथ की यात्रा का पुण्य लाभ लेते हैं। चार धामों की इस यात्रा में देश-विदेश से लाखों की संख्या में तीर्थयात्री शामिल होते हैं। अब यह यात्रा नौ से दस दिन में ही पूरी हो जाती है। अनेक तीर्थयात्री कुंभ मेले में शामिल होकर चार धाम की यात्रा के लिए कपाट खुलने से पहले ही पहुंच गए। चार धामों की ऊंचाई लगभग ३ हज़ार मीटर है। इन चार धामों की यात्रा की शुरुआत प्रमुख रुप से तीर्थ नगरी हरिद्वार से गंगा स्नान के साथ होती है। यहां से चार धामों की यात्रा का दायरा लगभग १५ सौ किलोमीटर है। सरकारी नियमों के अनुसार चार धाम की यात्रा दस दिन, तीन धाम की यात्रा आठ दिन, दो धाम की यात्रा छ: दिन और एक धाम की यात्रा एक दिन में पूरी हो जाना चाहिए। हालांकि वर्तमान में टिहरी बांध के निर्माण के बाद से यमुनोत्री और गंगोत्री धाम की दूरी लगभग २० से २५ किलोमीटर ज्यादा हुई है। किंतु पूर्व की तुलना में यमुनोत्री तक पहुंचने का सड़क मार्ग अब लगभग १० किलोमीटर कम हो गया है। पहले जहां बस या निजी वाहन हनुमान चट्टी तक ही पहुंच पाते थे, किंतु सड़क निर्माण के बाद यह जानकी चट्टी तक चले जाते हैं। जिससे अब यात्रा में अब लगभग चार या पांच किलोमीटर ही पैदल चलना होता है, जो पूर्व मे लगभग १५ किलोमीटर तक पैदल मार्ग था। इसके कारण चार धाम की यात्रा में भी एक या दो दिन की बचत हो जाती है। गंगोत्री तक भी सड़क मार्ग बना है। केदारनाथ की यात्रा की शुरुआत गौरीकुंड से होती है। यह यात्रा लगभग १५ से २० किलोमीटर की पैदल यात्रा है। बद्रीनाथ धाम की यात्रा तुलनात्मक रुप से सुविधाजनक है। प्रशासनिक स्तर पर चार धाम यात्रा में तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए हर स्तर पर अच्छी व्यवस्था की जाती है। प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए भी आपातकालीन सुरक्षा इंतजाम किए जाते हैं। यात्रियों को सभी मूलभूत सुविधाएं जैसे आवागमन, वाहन व्यवस्था, रहने, ठहरने, खान-पान, जल, चिकित्सा, नित्यकर्मों के लिए सुलभ स्थानों की पूरी व्यवस्था सरकार और स्थानीय धार्मिक सेवा संस्थाओं की ओर से की जाती है। विशेषकर महिलाओं, बच्चों और बुजूर्गों की सुविधा का विशेष ध्यान रखा जाता है। अधिक मास के कारण इस वर्ष यह तीर्थ यात्रा घटकर पांच माहों की रह गई है। चार धाम यात्रा के लिए हरिद्वार पहुंचने के लिए भारत के सभी प्रमुख शहरों से रेल, सड़क, वायु मार्ग से आवागमन के साधन उपलब्ध है।
Monday, June 14, 2010
प्रजा कल्याण
सुरथ मनु धर्मात्मा राजा थे। प्रजा को किसी प्रकार का कष्ट न हो, इसका वह विशेष ध्यान रखते थे। मेधा ऋषि से उन्होंने दीक्षा ली थी। गुरु ने उन्हें अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखने का उपदेश दिया। एक दिन किसी सलाहकार ने उनसे कहा, ‘राजा को प्रतिवर्ष अपने राज्य का विस्तार करते रहना चाहिए।’ सलाहकार की बातों ने राजा सुरथ के मन में राज्य विस्तार की आकांक्षा जगा दी। उन्होंने आसपास के अनेक राज्यों को अपने राज्य में मिला लिया। इस सफलता ने उनमें चक्रवर्ती सम्राट बनने की लालसा पैदा कर दी। एक बार उन्होंने सेना में वृद्धि कर कोवा विधवंशी नामक राजा पर आक्रमण कर दिया। पर उस राज्य के सैनिकों ने सुरथ की विशाल सेना का संहार कर दिया। सुरथ मनु इस हार से अत्यंत निराश हो गए। एक दिन वह मेधा ऋषि के आश्रम में पहुंचे और उनके चरणों में गिरकर बोले, ‘गुरुदेव, असीमित इच्छाओं के कारण मैं कहीं का न रहा। मैं साधु बनकर आपके चरणों में जीवन बिताना चाहता हूं।’ गुरु ने कहा, ‘मैंने कहा था कि आकांक्षाएं सीमित रखनी चाहिए। राज-मद को पास नहीं फटकने देना चाहिए। तुमने मेरे वचनों का पालन नहीं किया। इसी से तुम्हारी यह दशा हुई है। अब धैर्य रखो।’ गुरु के शब्दों से उनकी निराशा दूर हुई। कुछ समय बाद उन्होंने अपना राज्य फिर से वापस पा लिया। उसके बाद तो सुरथ किसी भी प्रकार की आकांक्षा और मद से दूर रहकर प्रजा कल्याण में लगे रहे।
Wednesday, June 9, 2010
असल खुशी
पेरिस स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के एक अध्ययन में पता चला है कि दूसरों से अपनी आमदनी का मुकाबला करने वाले लोग खुश नहीं रहते। अपने सहयोगियों या रिश्तेदारों का वेतन आंकने के बाद ऐसे लोग खुद को कमतर समझने लगते हैं और जल्दी ही अवसाद ग्रस्त हो जाते हैं। इसलिए आमदनी की तुलना से बचें।
Subscribe to:
Posts (Atom)








