महर्षि व्यास के पुत्र शुकदेव ने किसी विद्वान से ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त की। पिता ने उन्हें राजा जनक के पास भेज दिया। शुकदेव जी महाराज जनक के राजमहल पहुंचे। उन्हें लगा कि प्रचुर ऐश्वर्य से घिरे जनक क्या उपदेश देंगे? वह निराश होकर लौटने ही वाले थे कि जनक जी ने उन्हें बुलवाया और कहा, ‘धर्मचर्चा सत्संग भवन में करेंगे।’ सत्संग भवन पहुंचकर उन्होंने शुकदेव से आत्मा-परमात्मा संबंधी बातचीत शुरू कर दी। अचानक कुछ राज कर्मचारी हांफते हुए वहां पहुंचे और सूचना दी कि महल के एक कक्ष में आग लग गई है। राजा जनक ने शांत भाव से उत्तर दिया, ‘मैं इस समय मुनि के साथ ईश्वर संबंधी चिंतन में लीन हूं। आग से बचाव का प्रयास करो। सांसारिक संपत्ति नष्ट होती हो, तो हो जाने दो।’ देखते-देखते आग सत्संग भवन तक पहुंच गई। राजा जनक पास आती आग देखकर भी बेचैन नहीं हुए, किंतु शुकदेव अपनी पुस्तकें उठाकर उस कक्ष से बाहर निकल आए। उन्होंने देखा कि राजा जनक को न तो अपनी संपत्ति नष्ट होने की चिंता थी और न ही किसी के जलकर मरने की। वह निश्चिंत होकर ईश्वर चिंतन में लगे रहे। कुछ देर बाद महाराज जनक ने शुकदेव जी से कहा, ‘दुख का मूल संपत्ति नहीं, संपत्ति से आसक्ति है। संसार में हमें केवल वस्तुओं के उपयोग का अधिकार दिया गया है। अक्षय संपत्ति के स्वामी और निर्धन, दोनों को मृत्यु के समय सब कुछ यहीं छोड़कर जाना होता है। इसलिए नाशवान धन-संपत्ति के प्रति अधिक आसक्ति अधर्म है।’
Saturday, June 26, 2010
Friday, June 25, 2010
हस्त दर्शन
एक ऋषि अपने छात्रों को वेदों का अध्ययन करा रहे थे। उन्होंने ऋग्वेद के एक मंत्र अयं मे हस्तो भगवानयं में भगवत्तरः, अयं मे विश्वभेषजोडयं शिवाभिमर्शनः का अर्थ समझाया जिसका अर्थ था यह मेरा हाथ भगवान अर्थात ऐश्वर्यशाली है। यह अत्यंत भाग्यशाली है। यह दुनिया के सभी रोगों का चिकित्सक है। यह कल्याणकारी स्पर्शवाला है। ऋषि ने कहा इस संदेश का अर्थ यही है कि हाथों से श्रम या पुरुषार्थ करने वाला सदैव सुखी, प्रसन्न तथा स्वस्थ रहता है। वैसे तो मानव शरीर का प्रत्येक अंग महत्वपूर्ण है, किंतु कर्म और पुरुषार्थ में हाथों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। हाथों से निरंतर काम करते रहकर वैभवशाली बना जा सकता है। जबकि हाथों पर हाथ धरे बैठा व्यक्ति निठल्ला कहलाता है। जब हम अपने हाथों से श्रम करते हैं, तब रोग स्वतः दूर रहने को मजबूर हो जाते हैं।’ स्वामी के पास एक व्यक्ति पहुंचा। उसके चेहरे पर निराशा देखकर स्वामी जी ने इसका कारन पूछा ? उसने कहा, ‘धन की कमी के कारण परेशान हूं। मैं अपने को सबसे बड़ा अभागा मानने लगा हूं।’ स्वामी जी ने उसका हाथ अपने हाथ में लिया और बोले, ‘अरे मूर्ख, इन दो हाथों के होते हुए भी अभागे कैसे हो? इनकी मुट्ठियों में तो तुम्हारा भाग्य है। निराशा त्यागो और इन हाथों से श्रम करो, ऐश्वर्य स्वयं तुम्हारे पास दौड़ा आएगा।’ यदि कोई महिला स्वादिष्ट भोजन बनाती है, तो कहा जाता है कि उसके हाथों में जादू है। कोई चिकित्सक रोगियों को स्वस्थ कर देता है, तो कहा ही जाता है कि उस डॉक्टर के हाथ की शफा है। अगर कोई सच्चा संत सिर पर हाथ रख दे, तो कहा जाता है कि हाथ के स्पर्श से अपूर्व शांति मिली है। भारतीय परंपरा में इसलिए तो सवेरे शैया से उठकर सर्वप्रथम हस्त दर्शन करने को शुभ माना गया है।
Wednesday, June 23, 2010
ईश्वर की कृपा
सेठ जमनालाल बजाज ने आजीवन स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग संकल्प लिया था ! एक प्रतिज्ञा यह भी थी कि वह प्रतिदिन किसी-न-किसी संत-महात्मा या विद्वान का सत्संग करेंगे। वह एक दिन संत का सत्संग करने पहुंचे। इस दौरान उन्होंने कहा, ‘महाराज, आप जैसे संतों के आशीर्वाद से मैंने अपने जीवन में आय के इतने साधन अर्जित कर लिए हैं कि मेरी सात पीढ़ियों को कमाने की चिंता नहीं करनी पड़ेगी। कभी-कभी मुझे आठवीं पीढ़ी की चिंता होती है कि उसके भाग्य में पता नहीं, क्या होगा?’ संत जी ने कहा, ‘सेठ जी, आप चिंता न करें। कल आप यहां आ जाएं। सभी चिंताओं का समाधान हो जाएगा।’ सेठ जमनालाल बजाज अगली सुबह-सुबह उनकी कुटिया पर जा पहुंचे। संत ने कहा गांव के मंदिर के पास झाड़ू बनाने वाला एक गरीब परिवार झोपड़पट्टी में रहता है। उसे एक दिन के भोजन के लिए दाल-आटा दे आओ। सेठ आटा-दाल लेकर उस झोंपड़ी पर पहुंचे। दरवाजे पर आवाज देते ही एक वृद्धा निकलकर बाहर आई। सेठ जी ने उसे लाया हुआ सामान थमाया, तो वह बोली, ‘बेटा, इसे वापस लेकर जा। आज का दाना-पानी तो आ गया है।’ जमनालाल जी ने कहा, ‘तो कल के लिए इसे रख लो।’ वृद्धा बोली, ‘जब ईश्वर ने आज का इंतजाम कर दिया है, तो कल का भी वह अवश्य करेगा। आप इसे किसी जरूरतमंद को दे देना।’ वृद्धा के शब्द सुनकर सेठ जमनालाल बजाज पानी-पानी हो गए। उन्होंने विरक्ति और त्याग की मूर्ति उस वृद्धा के चरण छूकर आशीर्वाद मांगा और वापस हो गए। इस घटना के बाद वह स्वयं कहा करते थे ‘कर्म करते रहो ईश्वर की कृपा से आवश्यकताओं की पूर्ति अपने आप होती रहेगी।
Tuesday, June 22, 2010
विनम्रता और दया
सत्संग के लिए आने वालों से संत कबीर अकसर कहा करते थे कि अपने काम को पूरी लगन से करते हुए भगवान का चिंतन करते रहना चाहिए। एक दिन एक श्रद्धालु कबीर के दर्शन के लिए आया। उसने उनसे कहा, ‘बाबा आप तो दिन भर बैठे करघे पर कपड़ा बुनते रहते हैं। फिर भला भगवान का ध्यान-स्मरण कब कर लेते हैं?’ कबीर उसे अपने साथ लेकर गंगा तट पर पहुंचे। एक महिला गंगाजल से भरा गागर अपने सिर पर रखे लौट रही थी। गागर को उसने पूरी तरह छोड़ रखा था और मुंह से गंगा की महिमा के गीत गुनगुना रही थी। लेकिन गागर से एक बूंद भी गंगाजल नहीं छलक रहा था। कबीर उसकी तरफ इशारा करते हुए बोले, इस महिला को ध्यान से देखो। यह मुंह से गंगा का- भगवान का स्मरण कर रही है और इसे यह भी पूरा ध्यान है कि गागर गिर न पाए। दोनों काम एक साथ साधना इस महिला से सीखो। मैं भी हाथों से करघा चलाता हूं, और ऐसा करते हुए मुख से राम नाम जपता रहता हूं। परमात्मा का नाम तो हर क्षण भक्त के हृदय व मन में रमते रहना चाहिए।’ कबीर के इस उपदेश से जिज्ञासु की समस्या का समाधान हो गया। संत कबीर धर्म के नाम पर पनपने वाले आडंबर के घनघोर विरोधी थे। उन्होंने अपनी साखियों में अभिमान में अंधे, ढोंगी-नशेड़ी साधुओं पर काफी कठोर लहजे में प्रहार किए थे। अपने को चमत्कारी साधु या गुरु बताने वाले अहंकारी साधुओं पर उन्होंने लिखा, घर-घर मंतर देत फिरत हैं, महिमा के अभिमाना/ गुरु सहित शिष्य सब बूड़ें, अंत काल पछताना। कबीरदास का मत था कि वही साधु-महात्मा सच्चा गुरु कहलाने का अधिकारी है, जो स्वयं सदाचारी, संयमी और ज्ञानी है। जिसके मन में विनम्रता और दया का वास नहीं है, वह आखिर गुरु कैसे हो सकता है।
Monday, June 21, 2010
परम संतोष
धृतराष्ट्र समय-समय पर महात्मा विदुर के सत्संग के लिए लालायित रहा करते थे। वह जानते थे कि विदुर जो सलाह देते हैं, वह पूर्णतया धर्मसम्मत होती है। वह उनके कटु लगने वाले वचनों को भी कल्याणकारक मानते थे। एक दिन विदुर जी ने धृतराष्ट्र को उपदेश देते हुए कहा, ‘राजन, केवल धर्म ही कल्याणकारक है। एकमात्र क्षमा ही शांति का सर्वश्रेष्ठ उपाय है। विद्या ही परम संतोष देने वाली है। काम, क्रोध और लोभ, मनुष्य के पुण्य का नाश करने वाले नरक के तीन दरवाजे हैं। अतः हर हाल में इनका त्याग करना चाहिए।’ जब उन्होंने देखा कि धृतराष्ट्र पुत्रमोह में सत्य की अवहेलना कर रहे हैं, तो विदुर जी ने कहा, ‘जैसे नदी के पार जाने के लिए नाव ही एकमात्र साधन है, उसी प्रकार स्वर्ग के लिए सत्य ही एकमात्र सोपान है।’ विदुर जी जानते थे कि मोह के कारण ही धृतराष्ट्र पतन को प्राप्त होंगे। इसलिए वह उनसे अकसर कहते, ‘जैसे सूखी लकड़ी में मिल जाने से गीली लकड़ी भी जल जाती है, ठीक उसी तरह दुष्टों का त्याग न करने और उनके साथ मिले रहने से निरपराध सज्जनों को भी दंड भोगना पड़ता है, इसलिए दुर्व्यसनी एवं अहंकारी का साथ तुरंत त्याग देना चाहिए। किसी के मोह में पड़कर दूसरे के साथ अन्याय घोर अधर्म है। आप कौरवों और पांडवों के साथ समान रूप से कोमलता का व्यवहार कीजिए। ऐसा करने से आपको इस लोक में सुयश तो प्राप्त होगा ही, मृत्यु के बाद स्वर्गलोक की प्राप्ति होगी।’ विदुर को श्रीकृष्ण का पूर्ण आशीर्वाद प्राप्त था। भगवान श्रीकृष्ण भी उनकी धर्मपरायणता तथा भक्ति भावना के कायल थे।
Sunday, June 20, 2010
विनम्रता
शिक्षाविद और राजनेता डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी 1952 में भगवान बुद्ध के दो प्रधान शिष्यों सारिपुत्त और महमोग्गलामने के पवित्र भस्मावशेष लेकर म्यांमार गए थे। उसके बाद कंबोडिया के बौद्ध धर्मावलंबियों ने उन्हें अपने देश में आमंत्रित किया। कंबोडिया की राजधानी नॉमपेन्ह में आयोजित बौद्ध महासम्मेलन में उन्होंने कहा, ‘भगवान बुद्ध सनातन धर्मियों द्वारा दशावतार के रूप में पूजे जाते हैं। धर्म के नाम पर प्रचलित ऊंच-नीच की कुप्रवृत्ति के उन्मूलन में उनका योगदान सराहनीय है। उनके इस ऋण से हम कभी उऋण नहीं हो सकते।’ बौद्ध धर्म व दर्शन पर उनका भाषण सुनकर सभी प्रभावित हुए। सम्मेलन में उपस्थित कंबोडिया के एक बौद्ध लामा डॉ. मुखर्जी की श्रद्धा-भावना देखकर भाव-विह्वल हो उठे। वह मुखर्जी के पास पहुंचे और यह कहकर उनके पैरों की ओर झुके कि आप हमारे भगवान बुद्ध की पावन जन्मभूमि में जन्मे हैं, इसलिए हमारे लिए श्रद्धा भाजन हैं। इस पर मुखर्जी ने उन्हें रोकते हुए कहा, ‘आप भिक्षु हैं और हमारी संस्कृति में साधु-संतों के चरण स्पर्श करने की परंपरा है।’ यह कहते-कहते वह तुरंत उनके चरणों में झुक गए। डॉ. मुखर्जी जैसे अग्रणी नेता की इस विनम्रता को देखकर सभी हतप्रभ रह गए। डॉ. मुखर्जी परम धार्मिक व्यक्ति और विनम्रता की मूर्ति थे। 23 जून, 1953 को श्रीनगर में नजरबंदी के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। नजरबंदी काल में भी प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती का पाठ करने के बाद ही वह अन्न-जल ग्रहण करते थे
Tuesday, June 15, 2010
साफ-सफाई
विश्व, खासकर विकासशील देशों के सामने स्वच्छ जल और साफ-सफाई की कमी एक बड़ी चुनौती है। यूनीसेफ के अनुसार, विश्व में जलजनित बीमारियों के कारण हर १५ सेकंड में एक बच्चे की मौत हो रही है। इस स्थिति से बचने के लिए जरूरी है कि स्वच्छ जल संभव हो, तो उबला हुआ पानी का सेवन करें।
अहंकार पतन का कारण
राजा भुवनेश्वर ने अनेक अश्वमेध और वाजपेय यज्ञ कराए थे। उन्हें अहंकार हो गया कि पृथ्वी पर उनसे बड़ा धर्मात्मा और कोई नहीं है। उन्होंने राज्य में घोषणा करा दी कि यज्ञ होम करके ही पूजा-उपासना की जा सकती है। जो इस आज्ञा का पालन नहीं करेगा, उसे दंड दिया जाएगा। राज्य में हरिमित्र नामक एक पहुंचे हुए भक्त रहते थे। एक दिन नदी के तट पर जब वह वीणा पर संकीर्तन कर रहे थे, तो राजा के दूत ने उन्हें देख लिया। उसने राजा से शिकायत कर दी कि एक ब्राह्मण यज्ञ होम करने की जगह मूर्ति के सामने नाच-गाकर भगवान को रिझाने का प्रयास कर रहा है। अहंकार में डूबे राजा ने हरिमित्र को पकड़कर दरबार में बुलवाया और पूछा, ‘तुम वेदों के अनुसार यज्ञ-हवन न करके मनमानि ढंग से कीर्तन द्वारा पूजा क्यों कर रहे हो?’ हरिमित्र का उत्तर था, ‘राजन, मैं वेदशास्त्रों के गूढ़ रहस्यों को नहीं समझ सकता। भगवान की मूर्ति के सामने नाच-गाकर उनके नाम का उच्चारण करने से मुझे परम शांति मिलती है।’ राजा संतुष्ट नहीं हुआ और उसने उन्हें राज्य से निकल जाने का आदेश दिया। कुछ दिनों बाद राजा भुवनेश्वर की मृत्यु हो गई। यमराज ने उनके कर्मों का खाता देखकर उन्हें उल्लू की योनि में भेजने का आदेश दिया। राजा ने सकपकाकर धर्मराज से पूछा, ‘मैंने जीवन में असंख्य अश्वमेध यज्ञ किए हैं। प्रजा को धर्मशास्त्रों के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। ऐसा फिर भला कौन सा पाप है, जो मुझे उल्लू योनि में भेजा जा रहा है?’ धर्मराज ने राजा को हरिमित्र वाली घटना की याद दिलाते हुए बताया, ‘अहंकार और मनमाने व्यवहार के कारण ही तुम्हारे तमाम पुण्य क्षीण हो गए हैं। इसलिए तुम्हें उल्लू योनि में भेजा जा रहा है।’ राजा समझ गया कि अहंकार पतन का कारण अवश्य बनता है
चार प्रमुख तीर्थ
सनातन धर्मावलंबियों के लिए देवभूमि उत्तराखंड के चार प्रमुख तीर्थ - गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रीनाथ और केदारनाथ के कपाट खुलने के साथ ही पावन धामों की वार्षिक यात्रा वैशाख मास यानि मई माह में आरंभ होती है। चार धाम यात्रा के लिए गंगोत्री और यमुनोत्री के कपाट इस वर्ष ग्रीष्म काल के लिए अक्षय तृतीया के पुण्य दिन पर 16 मई को, केदारनाथ के 18 मई तथा बद्रीनाथ के कपाट 19 मई को खुले ! इन चार धामों की यात्रा पहले की तरह दुर्गम नहीं रह गई है। तीर्थयात्री धार्मिक महत्व के अनुसार चार धाम में सबसे पहले यमुनोत्री, गंगोत्री जाते हैं। उसके बाद केदारनाथ और आखिर में बद्रीनाथ की यात्रा का पुण्य लाभ लेते हैं। चार धामों की इस यात्रा में देश-विदेश से लाखों की संख्या में तीर्थयात्री शामिल होते हैं। अब यह यात्रा नौ से दस दिन में ही पूरी हो जाती है। अनेक तीर्थयात्री कुंभ मेले में शामिल होकर चार धाम की यात्रा के लिए कपाट खुलने से पहले ही पहुंच गए। चार धामों की ऊंचाई लगभग ३ हज़ार मीटर है। इन चार धामों की यात्रा की शुरुआत प्रमुख रुप से तीर्थ नगरी हरिद्वार से गंगा स्नान के साथ होती है। यहां से चार धामों की यात्रा का दायरा लगभग १५ सौ किलोमीटर है। सरकारी नियमों के अनुसार चार धाम की यात्रा दस दिन, तीन धाम की यात्रा आठ दिन, दो धाम की यात्रा छ: दिन और एक धाम की यात्रा एक दिन में पूरी हो जाना चाहिए। हालांकि वर्तमान में टिहरी बांध के निर्माण के बाद से यमुनोत्री और गंगोत्री धाम की दूरी लगभग २० से २५ किलोमीटर ज्यादा हुई है। किंतु पूर्व की तुलना में यमुनोत्री तक पहुंचने का सड़क मार्ग अब लगभग १० किलोमीटर कम हो गया है। पहले जहां बस या निजी वाहन हनुमान चट्टी तक ही पहुंच पाते थे, किंतु सड़क निर्माण के बाद यह जानकी चट्टी तक चले जाते हैं। जिससे अब यात्रा में अब लगभग चार या पांच किलोमीटर ही पैदल चलना होता है, जो पूर्व मे लगभग १५ किलोमीटर तक पैदल मार्ग था। इसके कारण चार धाम की यात्रा में भी एक या दो दिन की बचत हो जाती है। गंगोत्री तक भी सड़क मार्ग बना है। केदारनाथ की यात्रा की शुरुआत गौरीकुंड से होती है। यह यात्रा लगभग १५ से २० किलोमीटर की पैदल यात्रा है। बद्रीनाथ धाम की यात्रा तुलनात्मक रुप से सुविधाजनक है। प्रशासनिक स्तर पर चार धाम यात्रा में तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए हर स्तर पर अच्छी व्यवस्था की जाती है। प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए भी आपातकालीन सुरक्षा इंतजाम किए जाते हैं। यात्रियों को सभी मूलभूत सुविधाएं जैसे आवागमन, वाहन व्यवस्था, रहने, ठहरने, खान-पान, जल, चिकित्सा, नित्यकर्मों के लिए सुलभ स्थानों की पूरी व्यवस्था सरकार और स्थानीय धार्मिक सेवा संस्थाओं की ओर से की जाती है। विशेषकर महिलाओं, बच्चों और बुजूर्गों की सुविधा का विशेष ध्यान रखा जाता है। अधिक मास के कारण इस वर्ष यह तीर्थ यात्रा घटकर पांच माहों की रह गई है। चार धाम यात्रा के लिए हरिद्वार पहुंचने के लिए भारत के सभी प्रमुख शहरों से रेल, सड़क, वायु मार्ग से आवागमन के साधन उपलब्ध है।
Monday, June 14, 2010
प्रजा कल्याण
सुरथ मनु धर्मात्मा राजा थे। प्रजा को किसी प्रकार का कष्ट न हो, इसका वह विशेष ध्यान रखते थे। मेधा ऋषि से उन्होंने दीक्षा ली थी। गुरु ने उन्हें अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखने का उपदेश दिया। एक दिन किसी सलाहकार ने उनसे कहा, ‘राजा को प्रतिवर्ष अपने राज्य का विस्तार करते रहना चाहिए।’ सलाहकार की बातों ने राजा सुरथ के मन में राज्य विस्तार की आकांक्षा जगा दी। उन्होंने आसपास के अनेक राज्यों को अपने राज्य में मिला लिया। इस सफलता ने उनमें चक्रवर्ती सम्राट बनने की लालसा पैदा कर दी। एक बार उन्होंने सेना में वृद्धि कर कोवा विधवंशी नामक राजा पर आक्रमण कर दिया। पर उस राज्य के सैनिकों ने सुरथ की विशाल सेना का संहार कर दिया। सुरथ मनु इस हार से अत्यंत निराश हो गए। एक दिन वह मेधा ऋषि के आश्रम में पहुंचे और उनके चरणों में गिरकर बोले, ‘गुरुदेव, असीमित इच्छाओं के कारण मैं कहीं का न रहा। मैं साधु बनकर आपके चरणों में जीवन बिताना चाहता हूं।’ गुरु ने कहा, ‘मैंने कहा था कि आकांक्षाएं सीमित रखनी चाहिए। राज-मद को पास नहीं फटकने देना चाहिए। तुमने मेरे वचनों का पालन नहीं किया। इसी से तुम्हारी यह दशा हुई है। अब धैर्य रखो।’ गुरु के शब्दों से उनकी निराशा दूर हुई। कुछ समय बाद उन्होंने अपना राज्य फिर से वापस पा लिया। उसके बाद तो सुरथ किसी भी प्रकार की आकांक्षा और मद से दूर रहकर प्रजा कल्याण में लगे रहे।
Wednesday, June 9, 2010
असल खुशी
पेरिस स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के एक अध्ययन में पता चला है कि दूसरों से अपनी आमदनी का मुकाबला करने वाले लोग खुश नहीं रहते। अपने सहयोगियों या रिश्तेदारों का वेतन आंकने के बाद ऐसे लोग खुद को कमतर समझने लगते हैं और जल्दी ही अवसाद ग्रस्त हो जाते हैं। इसलिए आमदनी की तुलना से बचें।
Saturday, May 22, 2010
साधु के लक्षण
संत कबीरदास धर्म के नाम पर पाखंड करने वालों से बचकर रहने की प्रेरणा दिया करते थे। काशी के गंगातट पर वह किसी साधुवेशधारी को नशा करते या अमर्यादित आचरण करते देखते, तो उसे इन पाप कर्मों से बचने का सुझाव देते। एक बार किसी श्रद्धालु ने कबीर से पूछा, ‘साधु के लक्षण क्या होते हैं?’ उन्होंने तपाक से कहा, साधु सोई जानिए, चले साधु की चाल। परमारथ राता रहै, बोलै वचन रसाल। यानी संत उसी को जानो, जिसके आचरण संत की तरह शुद्ध हैं। जो परोपकार-परमार्थ में लगा हो और सबसे मीठे वचन बोलता हो। कबीरदास ने अपनी साखी में लिखा, ‘संत उन्हीं को जानो, जिन्होंने आशा, मोह, माया, मान, हर्ष, शोक और परनिंदा का त्याग कर दिया हो। सच्चे संतजन अपने मान-अपमान पर ध्यान नहीं देते। दूसरे से प्रेम करते हैं और उसका आदर भी करते हैं।’ उनका मानना था कि यदि साधु एक जगह ही रहने लगेगा,
तो वह मोह-माया से नहीं बच सकता। इसलिए उन्होंने लिखा, बहता पानी निरमला- बंदा गंदा होय। साधुजन रमता भला- दाग न लागै कोय। संत कबीरदास जानते थे कि ऐसा समय आएगा, जब सच्चे संतों की बात न मानकर लोग दुर्व्यसनियों की पूजा करेंगे। इसलिए उन्होंने लिखा था, यह कलियुग आयो अबै, साधु न मानै कोय। कामी, क्रोधी, मसखरा, तिनकी पूजा होय। आज कबीर की वाणी सच्ची साबित हो रही है तथा संत वेशधारी अनेक बाबा घृणित आरोपों में घिरे हैं।
तो वह मोह-माया से नहीं बच सकता। इसलिए उन्होंने लिखा, बहता पानी निरमला- बंदा गंदा होय। साधुजन रमता भला- दाग न लागै कोय। संत कबीरदास जानते थे कि ऐसा समय आएगा, जब सच्चे संतों की बात न मानकर लोग दुर्व्यसनियों की पूजा करेंगे। इसलिए उन्होंने लिखा था, यह कलियुग आयो अबै, साधु न मानै कोय। कामी, क्रोधी, मसखरा, तिनकी पूजा होय। आज कबीर की वाणी सच्ची साबित हो रही है तथा संत वेशधारी अनेक बाबा घृणित आरोपों में घिरे हैं।
Sunday, May 16, 2010
स्वच्छ जल
दुनिया में इनसान की जीवन प्रत्याशा बढ़कर औसतन ६६ वर्ष हो गई है, जो १९६० की औसत दर से २० वर्ष अधिक है। इसी तरह, पिछले ३० वर्षों में बाल मृत्यु-दर भी आधी हुई है। पर आज भी विश्व के एक अरब ३० करोड़ लोगों को पीने का साफ पानी नहीं मिल पाता। ऐसे में, स्वच्छ जल की हर बूंद की कीमत समझिए।
Saturday, May 15, 2010
सुक्तियां-निज भाषा उन्नति अहै
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल ।
अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन
पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन ।
उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय
निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय ।
निज भाषा उन्नति बिना, कबहुं न ह्यैहैं सोय
लाख उपाय अनेक यों भले करे किन कोय ।
इक भाषा इक जीव इक मति सब घर के लोग
तबै बनत है सबन सों, मिटत मूढ़ता सोग ।
और एक अति लाभ यह, या में प्रगट लखात
निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात ।
तेहि सुनि पावै लाभ सब, बात सुनै जो कोय
यह गुन भाषा और महं, कबहूं नाहीं होय ।
विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार
सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार ।
भारत में सब भिन्न अति, ताहीं सों उत्पात
विविध देस मतहू विविध, भाषा विविध लखात ।
सब मिल तासों छांड़ि कै, दूजे और उपाय
उन्नति भाषा की करहु, अहो भ्रातगन आय ।
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राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है।
- अवनींद्रकुमार विद्यालंकार।
हिंदी का काम देश का काम है, समूचे राष्ट्रनिर्माण का प्रश्न है।
- बाबूराम सक्सेना।
समस्त भारतीय भाषाओं के लिए यदि कोई एक लिपि आवश्यक हो तो वह देवनागरी ही हो सकती है। - (जस्टिस) कृष्णस्वामी अय्यर।
हिंदी का पौधा दक्षिणवालों ने त्याग से सींचा है। - शंकरराव कप्पीकेरी।
अकबर से लेकर औरंगजेब तक मुगलों ने जिस देशभाषा का स्वागत किया वह ब्रजभाषा थी, न कि उर्दू। -रामचंद्र शुक्ल।
राष्ट्रभाषा हिंदी का किसी क्षेत्रीय भाषा से कोई संघर्ष नहीं है। - अनंत गोपाल शेवड़े।
दक्षिण की हिंदी विरोधी नीति वास्तव में दक्षिण की नहीं, बल्कि कुछ अंग्रेजी भक्तों की नीति है।
- के.सी. सारंगमठ।
हिंदी ही भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है।
- वी. कृष्णस्वामी अय्यर।
राष्ट्रीय एकता की कड़ी हिंदी ही जोड़ सकती है।
- बालकृष्ण शर्मा नवीन।
विदेशी भाषा का किसी स्वतंत्र राष्ट्र के राजकाज और शिक्षा की भाषा होना सांस्कृतिक दासता है।
- वाल्टर चेनिंग।
हिंदी को तुरंत शिक्षा का माध्यम बनाइये।
- बेरिस कल्यएव।
अंग्रेजी सर पर ढोना डूब मरने के बराबर है।
- सम्पूर्णानंद।
एखन जतोगुलि भाषा भारते प्रचलित आछे ताहार मध्ये भाषा सर्वत्रइ प्रचलित।
- केशवचंद्र सेन।
देश को एक सूत्र में बाँधे रखने के लिए एक भाषा की आवश्यकता है।
- सेठ गोविंददास।
इस विशाल प्रदेश के हर भाग में शिक्षित-अशिक्षित, नागरिक और ग्रामीण सभी हिंदी को समझते हैं।
- राहुल सांकृत्यायन।
समस्त आर्यावर्त या ठेठ हिंदुस्तान की राष्ट्र तथा शिष्ट भाषा हिंदी या हिंदुस्तानी है।
-सर जार्ज ग्रियर्सन।
मुस्लिम शासन में हिंदी फारसी के साथ-साथ चलती रही पर कंपनी सरकार ने एक ओर फारसी पर हाथ साफ किया तो दूसरी ओर हिंदी पर।
- चंद्रबली पांडेय।
भारत की परंपरागत राष्ट्रभाषा हिंदी है। - नलिनविलोचन शर्मा।
जब से हमने अपनी भाषा का समादर करना छोड़ा तभी से हमारा अपमान और अवनति होने लगी। - (राजा) राधिकारमण प्रसाद सिंह।
यदि पक्षपात की दृष्टि से न देखा जाये तो उर्दू भी हिंदी का ही एक रूप है।
- शिवनंदन सहाय।
प्रत्येक नगर प्रत्येक मोहल्ले में और प्रत्येक गाँव में एक पुस्तकालय होने की आवश्यकता है।
- (राजा) कीर्त्यानंद सिंह।
अपनी सरलता के कारण हिंदी प्रवासी भाइयों की स्वत: राष्ट्रभाषा हो गई।
- भवानीदयाल संन्यासी।
यह कैसे संभव हो सकता है कि अंग्रेजी भाषा समस्त भारत की मातृभाषा के समान हो जाये?
- चंद्रशेखर मिश्र।
साहित्य की उन्नति के लिए सभाओं और पुस्तकालयों की अत्यंत आवश्यकता है।
- महामहो. पं. सकलनारायण शर्मा।
जो साहित्य केवल स्वप्नलोक की ओर ले जाये, वास्तविक जीवन को उपकृत करने में असमर्थ हो, वह नितांत महत्वहीन है। - (डॉ.) काशीप्रसाद जायसवाल।
भारतीय एकता के लक्ष्य का साधन हिंदी भाषा का प्रचार है।
- टी. माधवराव।
हिंदी हिंद की, हिंदियों की भाषा है।
- र. रा. दिवाकर।
यह संदेह निर्मूल है कि हिंदीवाले उर्दू का नाश चाहते हैं।
- राजेन्द्र प्रसाद।
उर्दू जबान ब्रजभाषा से निकली है।
- मुहम्मद हुसैन आजाद।
समाज और राष्ट्र की भावनाओं को परिमार्जित करने वाला साहित्य ही सच्चा साहित्य है।
- जनार्दनप्रसाद झाद्विज।
मजहब को यह मौका न मिलना चाहिए कि वह हमारे साहित्यिक, सामाजिक, सभी क्षेत्रों में टाँग अड़ाए। - राहुल सांकृत्यायन।
शिक्षा के प्रसार के लिए नागरी लिपि का सर्वत्र प्रचार आवश्यक है।
- शिवप्रसाद सितारेहिंद।
हमारी हिंदी भाषा का साहित्य किसी भी दूसरी भारतीय भाषा से किसी अंश से कम नहीं है।
- (रायबहादुर) रामरणविजय सिंह।
वही भाषा जीवित और जाग्रत रह सकती है जो जनता का ठीक-ठीक प्रतिनिधित्व कर सके।
- पीर मुहम्मद मूनिस।
भारतेंदु और द्विवेदी ने हिंदी की जड़ पाताल तक पहँुचा दी है; उसे उखाड़ने का जो दुस्साहस करेगा वह निश्चय ही भूकंपध्वस्त होगा। - शिवपूजन सहाय।
चक्कवै दिली के अथक्क अकबर सोऊ, नरहर पालकी को आपने कँधा करै।
- बेनी कवि।
यह निर्विवाद है कि हिंदुओं को उर्दू भाषा से कभी द्वेष नहीं रहा। - ब्रजनंदन दास।
देहात का विरला ही कोई मुसलमान प्रचलित उर्दू भाषा के दस प्रतिशत शब्दों को समझ पाता है।
- साँवलिया बिहारीलाल वर्मा।
हिंदी भाषा अपनी अनेक धाराओं के साथ प्रशस्त क्षेत्र में प्रखर गति से प्रकाशित हो रही है।
- छविनाथ पांडेय।
देवनागरी ध्वनिशास्त्र की दृष्टि से अत्यंत वैज्ञानिक लिपि है।
- रविशंकर शुक्ल।
हमारी नागरी दुनिया की सबसे अधिक वैज्ञानिक लिपि है।
- राहुल सांकृत्यायन।
नागरी प्रचार देश उन्नति का द्वार है।
- गोपाललाल खत्री।
साहित्य का स्रोत जनता का जीवन है।
- गणेशशंकर विद्यार्थी।
अंग्रेजी से भारत की रक्षा नहीं हो सकती।
- पं. कृ. पिल्लयार।
उसी दिन मेरा जीवन सफल होगा जिस दिन मैं सारे भारतवासियों के साथ शुद्ध हिंदी में वार्तालाप करूँगा। - शारदाचरण मित्र।
हिंदी के ऊपर आघात पहुँचाना हमारे प्राणधर्म पर आघात पहुँचाना है।
- जगन्नाथप्रसाद मिश्र।
हिंदी जाननेवाला व्यक्ति देश के किसी कोने में जाकर अपना काम चला लेता है।
- देवव्रत शास्त्री।
हिंदी और नागरी का प्रचार तथा विकास कोई भी रोक नहीं सकता।
- गोविन्दवल्लभ पंत।
भारत की सारी प्रांतीय भाषाओं का दर्जा समान है।
- रविशंकर शुक्ल।
किसी साहित्य की नकल पर कोई साहित्य तैयार नहीं होता।
- सूर्यकांत त्रिपाठी निराला।
हार सरोज हिए है लसै मम ऐसी गुनागरी नागरी होय।
- ठाकुर त्रिभुवननाथ सिंह।
भाषा ही से हृदयभाव जाना जाता है। शून्य किंतु प्रत्यक्ष हुआ सा दिखलाता है।
- माधव शुक्ल।
संस्कृत मां, हिंदी गृहिणी और अंग्रेजी नौकरानी है।
- डॉ. फादर कामिल बुल्के।
भाषा विचार की पोशाक है।
- डॉ. जानसन।
रामचरित मानस हिंदी साहित्य का कोहनूर है।
- यशोदानंदन अखौरी।
साहित्य के हर पथ पर हमारा कारवाँ तेजी से बढ़ता जा रहा है। - रामवृक्ष बेनीपुरी।
कवि संमेलन हिंदी प्रचार के बहुत उपयोगी साधन हैं।
- श्रीनारायण चतुर्वेदी।
हिंदी चिरकाल से ऐसी भाषा रही है जिसने मात्र विदेशी होने के कारण किसी शब्द का बहिष्कार नहीं किया।
- राजेंद्रप्रसाद।
देवनागरी अक्षरों का कलात्मक सौंदर्य नष्ट करना कहाँ की बुद्धिमानी है
? - शिवपूजन सहाय।
जिस देश को अपनी भाषा और अपने साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता।
- देशरत्न डॉ. राजेन्द्रप्रसाद।
कविता कामिनि भाल में हिंदी बिंदी रूप, प्रकट अग्रवन में भई ब्रज के निकट अनूप।
- राधाचरण गोस्वामी।
हिंदी समस्त आर्यावर्त की भाषा है।
- शारदाचरण मित्र।
हिंदी भारतीय संस्कृति की आत्मा है।
- कमलापति त्रिपाठी।
मैं उर्दू को हिंदी की एक शैली मात्र मानता।
- मनोरंजन प्रसाद।
हिंदी भाषा को भारतीय जनता तथा संपूर्ण मानवता के लिये बहुत बड़ा उत्तरदायित्व सँभालना है। - सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या।
नागरीप्रचारिणी सभा, काशी की हीरकजयंती के पावन अवसर पर उपस्थित न हो सकने का मुझे बड़ा खेद है। - (प्रो.) तान युन् शान।
राष्ट्रभाषा हिंदी हो जाने पर भी हमारे व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन पर विदेशी भाषा का प्रभुत्व अत्यंत गर्हित बात है।
- कमलापति त्रिपाठी।
सभ्य संसार के सारे विषय हमारे साहित्य में आ जाने की ओर हमारी सतत् चेष्टा रहनी चाहिए।
- श्रीधर पाठक।
भारतवर्ष के लिए हिंदी भाषा ही सर्वसाधरण की भाषा होने के उपयुक्त है।
- शारदाचरण मित्र।
हिंदी भाषा और साहित्य ने तो जन्म से ही अपने पैरों पर खड़ा होना सीखा है।
- धीरेन्द्र वर्मा।
जब हम अपना जीवन, जननी हिंदी, मातृभाषा हिंदी के लिये समर्पण कर दे तब हम किसी के प्रेमी कहे जा सकते हैं।
- सेठ गोविंददास।
कविता सुखी और उत्तम मनुष्यों के उत्तम और सुखमय क्षणों का उद्गार है।
- शेली।
भाषा की समस्या का समाधान सांप्रदायिक दृष्टि से करना गलत है।
- लक्ष्मीनारायण सुधांशु।
भारतीय साहित्य और संस्कृति को हिंदी की देन बड़ी महत्त्वपूर्ण है।
- सम्पूर्णानन्द।
हिंदी के पुराने साहित्य का पुनरुद्धार प्रत्येक साहित्यिक का पुनीत कर्तव्य है।
- पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल।
परमात्मा से प्रार्थना है कि हिंदी का मार्ग निष्कंटक करें
। - हरगोविंद सिंह।
अहिंदी भाषा-भाषी प्रांतों के लोग भी सरलता से टूटी-फूटी हिंदी बोलकर अपना काम चला लेते हैं। - अनंतशयनम् आयंगार।
वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।
- मैथिलीशरण गुप्त।
दाहिनी हो पूर्ण करती है अभिलाषा पूज्य हिंदी भाषा हंसवाहिनी का अवतार है
। - अज्ञात।
वास्तविक महान् व्यक्ति तीन बातों द्वारा जाना जाता है- योजना में उदारता, उसे पूरा करने में मनुष्यता और सफलता में संयम।
- बिस्मार्क।
हिंदुस्तान की भाषा हिंदी है और उसका दृश्यरूप या उसकी लिपि सर्वगुणकारी नागरी ही है
। - गोपाललाल खत्री।
कविता मानवता की उच्चतम अनुभूति की अभिव्यक्ति है।
- हजारी प्रसाद द्विवेदी।
हिंदी ही के द्वारा अखिल भारत का राष्ट्रनैतिक ऐक्य सुदृढ़ हो सकता है।
- भूदेव मुखर्जी।
हिंदी का शिक्षण भारत में अनिवार्य ही होगा।
- सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या।
हिंदी, नागरी और राष्ट्रीयता अन्योन्याश्रित है।
- नन्ददुलारे वाजपेयी।
अकबर की सभा में सूर के जसुदा बार-बार यह भाखै पद पर बड़ा स्मरणीय विचार हुआ था।
- राधाचरण गोस्वामी।
देशभाषा की उन्नति से ही देशोन्नति होती है। - सुधाकर द्विवेदी।
हिंदी साहित्य धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष इस चतु:पुरुषार्थ का साधक अतएव जनोपयोगी।
- (डॉ.) भगवानदास।
हिंदी उन सभी गुणों से अलंकृत है जिनके बल पर वह विश्व की साहित्यिक भाषाओं की अगली श्रेणी में सभासीन हो सकती है।
- मैथिलीशरण गुप्त।
वाणी, सभ्यता और देश की रक्षा करना सच्चा धर्म यज्ञ है।
- ठाकुरदत्त शर्मा।
निष्काम कर्म ही सर्वोत्तम कार्य है, जो तृप्ति प्रदाता है और व्यक्ति और समाज की शक्ति बढ़ाता है।
- पंडित सुधाकर पांडेय।
अब हिंदी ही माँ भारती हो गई है- वह सबकी आराध्य है, सबकी संपत्ति है।
- रविशंकर शुक्ल।
बच्चों को विदेशी लिपि की शिक्षा देना उनको राष्ट्र के सच्चे प्रेम से वंचित करना है।
- भवानीदयाल संन्यासी।
यहाँ (दिल्ली) के खुशबयानों ने मताहिद (गिनी चुनी) जबानों से अच्छे अच्छे लफ्ज निकाले और बाजे इबारतों और अल्फाज में तसर्रूफ (परिवर्तन) करके एक नई जवान पैदा की जिसका नाम उर्दू रखा है।
- दरियाये लताफत।
भाषा और राष्ट्र में बड़ा घनिष्ट संबंध है।
- (राजा) राधिकारमण प्रसाद सिंह।
अगर उर्दूवालों की नीति हिंदी के बहिष्कार की न होती तो आज लिपि के सिवा दोनों में कोई भेद न पाया जाता।
- देशरत्न डॉ. राजेंद्रप्रसाद।
हिंदी भाषा की उन्नति का अर्थ है राष्ट्र और जाति की उन्नति।
- रामवृक्ष बेनीपुरी।
बाजारवाली बोली विश्वविद्यालयों में काम नहीं दे सकती।
- संपूर्णानंद।
भारतेंदु का साहित्य मातृमंदिर की अर्चना का साहित्य है।
- बदरीनाथ शर्मा।
तलवार के बल से न कोई भाषा चलाई जा सकती है न मिटाई।
- शिवपूजन सहाय।
अखिल भारत के परस्पर व्यवहार के लिये ऐसी भाषा की आवश्यकता है जिसे जनता का अधिकतम भाग पहले से ही जानता समझता है।
- महात्मा गाँधी।
हिंदी को राजभाषा करने के बाद पूरे पंद्रह वर्ष तक अंग्रेजी का प्रयोग करना पीछे कदम हटाना है।- राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन।
भाषा राष्ट्रीय शरीर की आत्मा है।
- स्वामी भवानीदयाल संन्यासी।
हिंदी के राष्ट्रभाषा होने से जहाँ हमें हर्षोल्लास है, वहीं हमारा उत्तरदायित्व भी बहुत बढ़ गया है।
- मथुरा प्रसाद दीक्षित।
भारतवर्ष में सभी विद्याएँ सम्मिलित परिवार के समान पारस्परिक सद्भाव लेकर रहती आई हैं।
- रवींद्रनाथ ठाकुर।
इतिहास को देखते हुए किसी को यह कहने का अधिकारी नहीं कि हिंदी का साहित्य जायसी के पहले का नहीं मिलता।
- (डॉ.) काशीप्रसाद जायसवाल।
संप्रति जितनी भाषाएं भारत में प्रचलित हैं उनमें से हिंदी भाषा प्राय: सर्वत्र व्यवहृत होती है।
- केशवचंद्र सेन।
हिंदी ने राष्ट्रभाषा के पद पर सिंहानसारूढ़ होने पर अपने ऊपर एक गौरवमय एवं गुरुतर उत्तरदायित्व लिया है। - गोविंदबल्लभ पंत।
हिंदी जिस दिन राजभाषा स्वीकृत की गई उसी दिन से सारा राजकाज हिंदी में चल सकता था।
- सेठ गोविंददास।
हिंदी भाषी प्रदेश की जनता से वोट लेना और उनकी भाषा तथा साहित्य को गालियाँ देना कुछ नेताओं का दैनिक व्यवसाय है।
- (डॉ.) रामविलास शर्मा।
जब एक बार यह निश्चय कर लिया गया कि सन् १९६५ से सब काम हिंदी में होगा, तब उसे अवश्य कार्यान्वित करना चाहिए।
- सेठ गोविंददास।
साहित्यसेवा और धर्मसाधना पर्यायवायी है।
- (म. म.) सत्यनारायण शर्मा।
जिसका मन चाहे वह हिंदी भाषा से हमारा दूर का संबंध बताये, मगर हम बिहारी तो हिंदी को ही अपनी भाषा, मातृभाषा मानते आए हैं।
- शिवनंदन सहाय।
उर्दू का ढाँचा हिंदी है, लेकिन सत्तर पचहत्तर फीसदी उधार के शब्दों से उर्दू दाँ तक तंग आ गए हैं।
- राहुल सांकृत्यायन।
मानस भवन में आर्यजन जिसकी उतारें आरती। भगवान भारतवर्ष में गूँजे हमारी भारती।
- मैथिलीशरण गुप्त।
गद्य जीवनसंग्राम की भाषा है। इसमें बहुत कार्य करना है, समय थोड़ा है।
- सूर्यकांत त्रिपाठी निराला।
अंग्रेजी हमें गूँगा और कूपमंडूक बना रही है।
- ब्रजभूषण पांडेय।
लाखों की संख्या में छात्रों की उस पलटन से क्या लाभ जिनमें अंग्रेजी में एक प्रार्थनापत्र लिखने की भी क्षमता नहीं है। - कंक।
मैं राष्ट्र का प्रेम, राष्ट्र के भिन्न-भिन्न लोगों का प्रेम और राष्ट्रभाषा का प्रेम, इसमें कुछ भी फर्क नहीं देखता। - र. रा. दिवाकर।
देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता स्वयं सिद्ध है।
- महावीर प्रसाद द्विवेदी।
हिमालय से सतपुड़ा और अंबाला से पूर्णिया तक फैला हुआ प्रदेश हिंदी का प्रकृत प्रांत है।
- राहुल सांकृत्यायन।
किसी राष्ट्र की राजभाषा वही भाषा हो सकती है जिसे उसके अधिकाधिक निवासी समझ सके।
- (आचार्य) चतुरसेन शास्त्री।
साहित्य के इतिहास में काल विभाजन के लिए तत्कालीन प्रवृत्तियों को ही मानना न्यायसंगत है।
- अंबाप्रसाद सुमन।
हिंदी भाषा हमारे लिये किसने बनाया? प्रकृति ने। हमारे लिये हिंदी प्रकृतिसिद्ध है।
- पं. गिरिधर शर्मा।
हिंदी भाषा उस समुद्र जलराशि की तरह है जिसमें अनेक नदियाँ मिली हों।
- वासुदेवशरण अग्रवाल।
भाषा देश की एकता का प्रधान साधन है।
- (आचार्य) चतुरसेन शास्त्री।
क्रांतदर्शी होने के कारण ऋषि दयानंद ने देशोन्नति के लिये हिंदी भाषा को अपनाया था।
- विष्णुदेव पौद्दार।
सच्चा राष्ट्रीय साहित्य राष्ट्रभाषा से उत्पन्न होता है।
- वाल्टर चेनिंग।
हिंदी के पौधे को हिंदू मुसलमान दोनों ने सींचकर बड़ा किया है।
- जहूरबख्श।
किसी लफ्ज के उर्दू न होने से मुराद है कि उर्दू में हुरूफ की कमी बेशी से वह खराद पर नहीं चढ़ा।
- सैयद इंशा अल्ला खाँ।
अंग्रेजी का पद चिरस्थायी करना देश के लिये लज्जा की बात है
- संपूर्णानंद।
हिंदी राष्ट्रभाषा है, इसलिये प्रत्येक व्यक्ति को, प्रत्येक भारतवासी को इसे सीखना चाहिए।
- रविशंकर शुक्ल।
हिंदी प्रांतीय भाषा नहीं बल्कि वह अंत:प्रांतीय राष्ट्रीय भाषा है।
- छविनाथ पांडेय।
साहित्य को उच्च अवस्था पर ले जाना ही हमारा परम कर्तव्य है।
- पार्वती देवी।
विश्व की कोई भी लिपि अपने वर्तमान रूप में नागरी लिपि के समान नहीं।
- चंद्रबली पांडेय।
भाषा की एकता जाति की एकता को कायम रखती है।
- राहुल सांकृत्यायन।
जिस राष्ट्र की जो भाषा है उसे हटाकर दूसरे देश की भाषा को सारी जनता पर नहीं थोपा जा सकता - वासुदेवशरण अग्रवाल।
पराधीनता की विजय से स्वाधीनता की पराजय सहस्रगुना अच्छी है।
- अज्ञात।
समाज के अभाव में आदमी की आदमियत की कल्पना नहीं की जा सकती।
- पं. सुधाकर पांडेय।
तुलसी, कबीर, नानक ने जो लिखा है, उसे मैं पढ़ता हूँ तो कोई मुश्किल नहीं आती।
- मौलाना मुहम्मद अली।
भाषा का निर्माण सेक्रेटरियट में नहीं होता, भाषा गढ़ी जाती है जनता की जिह्वा पर।
- रामवृक्ष बेनीपुरी।
हिंदी भाषी ही एक ऐसी भाषा है जो सभी प्रांतों की भाषा हो सकती है। - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार।
जब हम हिंदी की चर्चा करते हैं तो वह हिंदी संस्कृति का एक प्रतीक होती है।
- शांतानंद नाथ।
भारतीय धर्म की है घोषणा घमंड भरी, हिंदी नहीं जाने उसे हिंदू नहीं जानिए।
- नाथूराम शंकर शर्मा।
राजनीति के चिंतापूर्ण आवेग में साहित्य की प्रेरणा शिथिल नहीं होनी चाहिए।
- राजकुमार वर्मा।
हिंदी में जो गुण है उनमें से एक यह है कि हिंदी मर्दानी जबान है।
- सुनीति कुमार चाटुर्ज्या।
स्पर्धा ही जीवन है, उसमें पीछे रहना जीवन की प्रगति खोना है।
- निराला।
कविता हमारे परिपूर्ण क्षणों की वाणी है।
- सुमित्रानंदन पंत।
बिना मातृभाषा की उन्नति के देश का गौरव कदापि वृद्धि को प्राप्त नहीं हो सकता।
- गोविंद शास्त्री दुगवेकर।
उर्दू लिपि की अनुपयोगिता, भ्रामकता और कठोरता प्रमाणित हो चुकी है।
- रामरणविजय सिंह।
राष्ट्रभाषा राष्ट्रीयता का मुख्य अंश है। - श्रीमती सौ. चि. रमणम्मा देव।
बानी हिंदी भाषन की महरानी, चंद्र, सूर, तुलसी से जामें भए सुकवि लासानी।
- पं. जगन्नाथ चतुर्वेदी।
जय जय राष्ट्रभाषा जननि। जयति जय जय गुण उजागर राष्ट्रमंगलकरनि।
- देवी प्रसाद गुप्त।
हिंदी हमारी हिंदू संस्कृति की वाणी ही तो है।
- शांतानंद नाथ।
आज का लेखक विचारों और भावों के इतिहास की वह कड़ी है जिसके पीछे शताब्दियों की कड़ियाँ जुड़ी है।
- माखनलाल चतुर्वेदी।
विज्ञान के बहुत से अंगों का मूल हमारे पुरातन साहित्य में निहित है।
- सूर्यनारायण व्यास।
कोई कौम अपनी जबान के बगैर अच्छी तालीम नहीं हासिल कर सकती।
- सैयद अमीर अली मीर।
हिंदी और उर्दू में झगड़ने की बात ही नहीं है।
- ब्रजनंदन सहाय।
कविता हृदय की मुक्त दशा का शाब्दिक विधान है।
- रामचंद्र शुक्ल।
हमारी राष्ट्रभाषा का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीयता का दृढ़ निर्माण है।
- चंद्रबली पांडेय।
जिस शिक्षा से स्वाभिमान की वृत्ति जाग्रत नहीं होती वह शिक्षा किसी काम की नहीं।
- माधवराव सप्रे।
कालोपयोगी कार्य न कर सकने पर महापुरुष बन सकना संभव नहीं है।
- सू. च. धर।
मैं दुनिया की सब भाषाओं की इज्जत करता हूँ, परन्तु मेरे देश में हिंदी की इज्जत न हो, यह मैं नहीं सह सकता।
- विनोबा भावे।
आज का आविष्कार कल का साहित्य है।
- माखनलाल चतुर्वेदी।
भाषा के सवाल में मजहब को दखल देने का कोई हक नहीं।
- राहुल सांकृत्यायन।
जब तक संघ शक्ति उत्पन्न न होगी तब तक प्रार्थना में कुछ जान नहीं हो सकती। - माधव राव सप्रे।
हिंदी विश्व की महान भाषा है।
- राहुल सांकृत्यायन।
राष्ट्रीय एकता के लिये एक भाषा से कहीं बढ़कर आवश्यक एक लिपि का प्रचार होना है।
- ब्रजनंदन सहाय।
जो ज्ञान तुमने संपादित किया है उसे वितरित करते रहो ओर सबको ज्ञानवान बनाकर छोड़ो।
- संत रामदास।
पाँच मत उधर और पाँच मत इधर रहने से श्रेष्ठता नहीं आती।
- माखनलाल चतुर्वेदी।
मैं मानती हूँ कि हिंदी प्रचार से राष्ट्र का ऐक्य जितना बढ़ सकता है वैसा बहुत कम चीजों से बढ़ सकेगा।
- लीलावती मुंशी।
हिंदी उर्दू के नाम को दूर कीजिए एक भाषा बनाइए। सबको इसके लिए तैयार कीजिए।
- देवी प्रसाद गुप्त।
साहित्यकार विश्वकर्मा की अपेक्षा कहीं अधिक सामर्थ्यशाली है।
- पं. वागीश्वर जी।
हिंदी भाषा और हिंदी साहित्य को सर्वांगसुंदर बनाना हमारा कर्त्तव्य है।
- डॉ. राजेंद्रप्रसाद।
हिंदी साहित्य की नकल पर कोई साहित्य तैयार नहीं होता।
- सूर्य कांत त्रिपाठी निराला।
भाषा के उत्थान में एक भाषा का होना आवश्यक है। इसलिये हिंदी सबकी साझा भाषा है।
- पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार।
यदि स्वदेशाभिमान सीखना है तो मछली से जो स्वदेश (पानी) के लिये तड़प तड़प कर जान दे देती है। - सुभाषचंद्र बसु।
पिछली शताब्दियों में संसार में जो राजनीतिक क्रांतियाँ हुई, प्राय: उनका सूत्रसंचालन उस देश के साहित्यकारों ने किया है।
- पं. वागीश्वर जी।
विजयी राष्ट्रवाद अपने आपको दूसरे देशों का शोषण कर जीवित रखना चाहता है।
- बी. सी. जोशी।
हिंदी हमारे देश और भाषा की प्रभावशाली विरासत है।
- माखनलाल चतुर्वेदी।
यदि लिपि का बखेड़ा हट जाये तो हिंदी उर्दू में कोई विवाद ही न रहे।
- बृजनंदन सहाय।
भारत सरस्वती का मुख संस्कृत है।
- म. म. रामावतार शर्मा।
साधारण कथा कहानियों तथा बालोपयोगी कविता में संस्कृत के सामासिक शब्द लाने से उनके मूल उद्देश्य की सफलता में बाधा पड़ती है।
- रघुवरप्रसाद द्विवेदी।
यदि आप मुझे कुछ देना चाहती हों तो इस पाठशाला की शिक्षा का माध्यम हमारी मातृभाषा कर दें। - एक फ्रांसीसी बालिका।
निर्मल चरित्र ही मनुष्य का शृंगार है।
- पंडित सुधाकर पांडेय।
हिंदुस्तान को छोड़कर दूसरे मध्य देशों में ऐसा कोई अन्य देश नहीं है, जहाँ कोई राष्ट्रभाषा नहीं हो।
- सैयद अमीर अली मीर।
इतिहास में जो सत्य है वही अच्छा है और जो असत्य है वही बुरा है।
- जयचंद्र विद्यालंकार।
सरलता, बोधगम्यता और शैली की दृष्टि से विश्व की भाषाओं में हिंदी महानतम स्थान रखती है।
- अमरनाथ झा।
हिंदी सरल भाषा है। इसे अनायास सीखकर लोग अपना काम निकाल लेते हैं।
- जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी।
एक भाषा का प्रचार रहने पर केवल इसी के सहारे, यदि लिपिगत भिन्नता न हो तो, अन्यान्य राष्ट्र गठन के उपकरण आ जाने संभव हो सकते हैं।
- अयोध्याप्रसाद वर्मा।
किसी भाषा की उन्नति का पता उसमें प्रकाशित हुई पुस्तकों की संख्या तथा उनके विषय के महत्व से जाना जा सकता है।
- गंगाप्रसाद अग्निहोत्री।
जीवन के छोटे से छोटे क्षेत्र में हिंदी अपना दायित्व निभाने में समर्थ है।
- पुरुषोत्तमदास टंडन।
बिहार में ऐसा एक भी गाँव नहीं है जहाँ केवल रामायण पढ़ने के लिये दस-बीस मनुष्यों ने हिंदी न सीखी हो।
- सकलनारायण पांडेय।
संस्कृत की इशाअत (प्रचार) का एक बड़ा फायदा यह होगा कि हमारी मुल्की जबान (देशभाषा) वसीअ (व्यापक) हो जायगी।
- मौलवी महमूद अली।
संसार में देश के नाम से भाषा को नाम दिया जाता है और वही भाषा वहाँ की राष्ट्रभाषा कहलाती है।
- ताराचंद्र दूबे।
सर्वसाधारण पर जितना पद्य का प्रभाव पड़ता है उतना गद्य का नहीं।
- राजा कृत्यानंद सिंह।
जो गुण साहित्य की जीवनी शक्ति के प्रधान सहायक होते हैं उनमें लेखकों की विचारशीलता प्रधान है।
- नरोत्तम व्यास।
भाषा और भाव का परिवर्तन समाज की अवस्था और आचार विचार से अधिक संबंध रखता है।
- बदरीनाथ भट्ट।
साहित्य पढ़ने से मुख्य दो बातें तो अवश्य प्राप्त होती हैं, अर्थात् मन की शक्तियों को विकास और ज्ञान पाने की लालसा।
- बिहारीलाल चौबे।
देवनागरी और बंगला लिपियों को साथ मिलाकर देखना है।
- मन्नन द्विवेदी।
है भव्य भारत ही हमारी मातृभूमि हरी भरी। हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा और लिपि है नागरी।
- मैथिलीशरण गुप्त।
संस्कृत की विरासत हिंदी को तो जन्म से ही मिली है।
- राहुल सांकृत्यायन।
कैसे निज सोये भाग को कोई सकता है जगा, जो निज भाषा-अनुराग का अंकुर नहिं उर में उगा।
- हरिऔध।
हिंदी में हम लिखें पढ़ें, हिंदी ही बोलें।
- पं. जगन्नाथप्रसाद चतुर्वेदी।
जिस वस्तु की उपज अधिक होती है उसमें से बहुत सा भाग फेंक भी दिया जाता है। ग्रंथों के लिये भी ऐसा ही हिसाब है।
- गिरजाकुमार घोष।
यह जो है कुरबान खुदा का, हिंदी करे बयान सदा का।
- अज्ञात।
क्या संसार में कहीं का भी आप एक दृष्टांत उद्धृत कर सकते हैं जहाँ बालकों की शिक्षा विदेशी भाषाओं द्वारा होती हो।
- डॉ. श्यामसुंदर दास।
बँगला वर्णमाला की जाँच से मालूम होता है कि देवनागरी लिपि से निकली है और इसी का सीधा सादा रूप है। - रमेशचंद्र दत्त।
वास्तव में वेश, भाषा आदि के बदलने का परिणाम यह होता है कि आत्मगौरव नष्ट हो जाता है, जिससे देश का जातित्व गुण मिट जाता है।
- सैयद अमीर अली मीर।
दूसरों की बोली की नकल करना भाषा के बदलने का एक कारण है।
- गिरींद्रमोहन मित्र।
समालोचना ही साहित्य मार्ग की सुंदर सड़क है।
- म. म. गिरधर शर्मा चतुर्वेदी।
नागरी वर्णमाला के समान सर्वांगपूर्ण और वैज्ञानिक कोई दूसरी वर्णमाला नहीं है।
- बाबू राव विष्णु पराड़कर।
अन्य देश की भाषा ने हमारे देश के आचार व्यवहार पर कैसा बुरा प्रभाव डाला है।
- अनादिधन वंद्योपाध्याय।
व्याकरण चाहे जितना विशाल बने परंतु भाषा का पूरा-पूरा समाधान उसमें नहीं हो सकता।
- अनंतराम त्रिपाठी।
स्वदेशप्रेम, स्वधर्मभक्ति और स्वावलंबन आदि ऐसे गुण हैं जो प्रत्येक मनुष्य में होने चाहिए।
- रामजी लाल शर्मा।
गुणवान खानखाना सदृश प्रेमी हो गए रसखान और रसलीन से हिंदी प्रेमी हो गए।
- राय देवीप्रसाद।
वैज्ञानिक विचारों के पारिभाषिक शब्दों के लिये, किसी विषय के उच्च भावों के लिये, संस्कृत साहित्य की सहायता लेना कोई शर्म की बात नहीं है।
- गणपति जानकीराम दूबे।
हिंदुस्तान के लिये देवनागरी लिपि का ही व्यवहार होना चाहिए, रोमन लिपि का व्यवहार यहाँ हो ही नहीं सकता।
- महात्मा गाँधी।
अभिमान सौंदर्य का कटाक्ष है।
- अज्ञात।
कवि का हृदय कोमल होता है।
- गिरिजाकुमार घोष।
श्री रामायण और महाभारत भारत के ही नहीं वरन् पृथ्वी भर के जैसे अमूल्य महाकाव्य हैं।
- शैलजाकुमार घोष।
हिंदी किसी के मिटाने से मिट नहीं सकती।
- चंद्रबली पाण्डेय।
भाषा की उन्नति का पता मुद्रणालयों से भी लग सकता है।
- गंगाप्रसाद अग्निहोत्री।
पुस्तक की उपयोगिता को चिरस्थायी रखने के लिए उसे भावी संतानों के लिये पथप्रदर्शक बनाने के लिये यह आवश्यक है कि पुस्तक के असली लेखक का नाम उस पर रहे।
- सत्यदेव परिव्राजक।
खड़ी बोली का एक रूपांतर उर्दू है।
- बदरीनाथ भट्ट।
भारतवर्ष मनुष्य जाति का गुरु है।
- विनयकुमार सरकार।
हमारी भारत भारती की शैशवावस्था का रूप ब्राह्मी या देववाणी है, उसकी किशोरावस्था वैदिक भाषा और संस्कृति उसकी यौवनावस्था की संुदर मनोहर छटा है।
- बदरीनारायण चौधरी प्रेमधन।
हृतंत्री की तान पर नीरव गान गाने से न किसी के प्रति किसी की अनुकम्पा जगती है और न कोई किसी का उपकार करने पर ही उतारू होता है।
- रामचंद्र शुक्ल।
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
- भारतेंदू हरिश्चंद्र।
आर्यों की सबसे प्राचीन भाषा हिंदी ही है और इसमें तद्भव शब्द सभी भाषाओं से अधिक है।
- वीम्स साहब।
क्यों न वह फिर रास्ते पर ठीक चलने से डिगे , हैं बहुत से रोग जिसके एक ही दिल में लगे।
- हरिऔध।
जब तक साहित्य की उन्नति न होगी, तब तक संगीत की उन्नति नहीं हो सकती।
- विष्णु दिगंबर।
जो पढ़ा-लिखा नहीं है - जो शिक्षित नहीं है वह किसी भी काम को भली-भाँति नहीं कर सकता।
- गोपाललाल खत्री।
राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा है।
- महात्मा गाँधी।
जिस प्रकार बंगाल भाषा के द्वारा बंगाल में एकता का पौधा प्रफुल्लित हुआ है उसी प्रकार हिंदी भाषा के साधारण भाषा होने से समस्त भारतवासियों में एकता तरु की कलियाँ अवश्य ही खिलेंगी।
- शारदाचरण मित्र।
इतिहास स्वदेशाभिमान सिखाने का साधन है।
- महात्मा गांधी।
जो दिखा सके वही दर्शन शास्त्र है नहीं तो वह अंधशास्त्र है।
- डॉ. भगवानादास।
विदेशी लोगों का अनुकरण न किया जाय।
- भीमसेन शर्मा।
भारतवर्ष के लिये देवनागरी साधारण लिपि हो सकती है और हिंदी भाषा ही सर्वसाधारण की भाषा होने के उपयुक्त है।
- शारदाचरण मित्र।
अकबर का शांत राज्य हमारी भाषा का मानो स्वर्णमय युग था।
- छोटूलाल मिश्र।
नाटक का जितना ऊँचा दरजा है, उपन्यास उससे सूत भर भी नीचे नहीं है।
- गोपालदास गहमरी।
किसी भी बृहत् कोश में साहित्य की सब शाखाओं के शब्द होने चाहिए।
- महावीर प्रसाद द्विवेदी।
जो कुछ भी नजर आता है वह जमीन और आसमान की गोद में उतना सुंदर नहीं जितना नजर में है।
- निराला।
देव, जगदेव, देश जाति की सुखद प्यारी, जग में गुणगरी सुनागरी हमारी है।
- चकोर।
शिक्षा का मुख्य तात्पर्य मानसिक उन्नति है।
- पं. रामनारायण मिश्र।
भारत के एक सिरे से दूसरे सिरे तक हिंदी भाषा कुछ न कुछ सर्वत्र समझी जाती है।
- पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार।
जापानियों ने जिस ढंग से विदेशी भाषाएँ सीखकर अपनी मातृभाषा को उन्नति के शिखर पर पहुँचाया है उसी प्रकार हमें भी मातृभाषा का भक्त होना चाहिए।
- श्यामसुंदर दास।
विचारों का परिपक्व होना भी उसी समय संभव होता है, जब शिक्षा का माध्यम प्रकृतिसिद्ध मातृभाषा हो।
- पं. गिरधर शर्मा।
विज्ञान को विज्ञान तभी कह सकते हैं जब वह शरीर, मन और आत्मा की भूख मिटाने की पूरी ताकत रखता हो।
- महात्मा गांधी।
यह महात्मा गाँधी का प्रताप है, जिनकी मातृभाषा गुजराती है पर हिंदी को राष्ट्रभाषा जानकर जो उसे अपने प्रेम से सींच रहे हैं।
- लक्ष्मण नारायण गर्दे।
हिंदी भाषा के लिये मेरा प्रेम सब हिंदी प्रेमी जानते हैं।
- महात्मा गांधी।
सब विषयों के गुण-दोष सबकी दृष्टि में झटपट तो नहीं आ जाते।
- म. म. गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी।
किसी देश में ग्रंथ बनने तक वैदेशिक भाषा में शिक्षा नहीं होती थी। देश भाषाओं में शिक्षा होने के कारण स्वयं ग्रंथ बनते गए हैं।
- साहित्याचार्य रामावतार शर्मा।
जो भाषा सामयिक दूसरी भाषाओं से सहायता नहीं लेती वह बहुत काल तक जीवित नहीं रह सकती।
- पांडेय रामवतार शर्मा।
नागरीप्रचारिणी सभा के गुण भारी जिन तेरों देवनागरी प्रचार करिदीनो है।
- नाथूराम शंकर शर्मा।
जितना और जैसा ज्ञान विद्यार्थियों को उनकी जन्मभाषा में शिक्षा देने से अल्पकाल में हो सकता है; उतना और वैसा पराई भाषा में सुदीर्घ काल में भी होना संभव नहीं है।
- घनश्याम सिंह।
विदेशी भाषा में शिक्षा होने के कारण हमारी बुद्धि भी विदेशी हो गई है।
- माधवराव सप्रे।
मैं महाराष्ट्री हूँ, परंतु हिंदी के विषय में मुझे उतना ही अभिमान है जितना किसी हिंदी भाषी को हो सकता है।
- माधवराव सप्रे।
मनुष्य सदा अपनी मातृभाषा में ही विचार करता है। इसलिये अपनी भाषा सीखने में जो सुगमता होती है दूसरी भाषा में हमको वह सुगमता नहीं हो सकती।
- डॉ. मुकुन्दस्वरूप वर्मा।
हिंदी भाषा का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है।
- महात्मा गांधी।
राष्ट्रीयता का भाषा और साहित्य के साथ बहुत ही घनिष्ट और गहरा संबंध है।
- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद।
यदि हम अंग्रेजी दूसरी भाषा के समान पढ़ें तो हमारे ज्ञान की अधिक वृद्धि हो सकती है।
- जगन्नाथप्रसाद चतुर्वेदी।
स्वतंत्रता की कोख से ही आलोचना का जन्म है।
- मोहनलाल महतो वियोगी।
युग के साथ न चल सकने पर महात्माओं का महत्त्व भी म्लान हो उठता है।
- सु. च. धर।
हिंदी पर ना मारो ताना, सभा बतावे हिंदी माना।
- नूर मुहम्मद।
आप जिस तरह बोलते हैं, बातचीत करते हैं, उसी तरह लिखा भी कीजिए। भाषा बनावटी न होनी चाहिए।
- महावीर प्रसाद द्विवेदी।
हिंदी भाषा की उन्नति के बिना हमारी उन्नति असम्भव है।
- गिरधर शर्मा।
भाषा ही राष्ट्र का जीवन है।
- पुरुषोत्तमदास टंडन।
देह प्राण का ज्यों घनिष्ट संबंध अधिकतर। है तिससे भी अधिक देशभाषा का गुरुतर।
- माधव शुक्ल।
जब हम अपना जीवन जननी हिंदी, मातृभाषा हिंदी के लिये समर्पण कर दें तब हम हिंदी के प्रेमी कहे जा सकते हैं। - गोविन्ददास।
नागरी प्रचार देश उन्नति का द्वार है।
- गोपाललाल खत्री।
देश तथा जाति का उपकार उसके बालक तभी कर सकते हैं, जब उन्हें उनकी भाषा द्वारा शिक्षा मिली हो।
- पं. गिरधर शर्मा।
राष्ट्रभाषा की साधना कोरी भावुकता नहीं है।
- जगन्नाथप्रसाद मिश्र।
साहित्य को स्वैर संचा करने की इजाजत न किसी युग में रही होगी न वर्तमान युग में मिल सकती है।
- माखनलाल चतुर्वेदी।
अंग्रेजी सीखकर जिन्होंने विशिष्टता प्राप्त की है, सर्वसाधारण के साथ उनके मत का मेल नहीं होता। हमारे देश में सबसे बढ़कर जातिभेद वही है, श्रेणियों में परस्पर अस्पृश्यता इसी का नाम है।
- रवीन्द्रनाथ ठाकुर।
साहित्य की सेवा भगवान का कार्य है, आप काम में लग जाइए आपको भगवान की सहायता प्राप्त होगी और आपके मनोरथ परिपूर्ण होंगे।
- चंद्रशेखर मिश्र।
सब से जीवित रचना वह है जिसे पढ़ने से प्रतीत हो कि लेखक ने अंतर से सब कुछ फूल सा प्रस्फुटित किया है।
- शरच्चंद।
सिक्ख गुरुओं ने आपातकाल में हिंदी की रक्षा के लिये ही गुरुमुखी रची थी।
- संतराम शर्मा।
हिंदी जैसी सरल भाषा दूसरी नहीं है।
- मौलाना हसरत मोहानी।
ऐसे आदमी आज भी हमारे देश में मौजूद हैं जो समझते हैं कि शिक्षा को मातृभाषा के आसन पर बिठा देने से उसकी कीमत ही घट जायेगी।
- रवीन्द्रनाथ ठाकुर।
लोकोपकारी विषयों को आदर देने वाली नवीन प्रथा का स्थिर हो जाना ही एक बहुत बड़ा उत्साहप्रद कार्य है। - मिश्रबंधु।
हमारे साहित्य को कामधेनु बनाना है।
- चंद्रबली पांडेय।
भारत के विभिन्न प्रदेशों के बीच हिंदी प्रचार द्वारा एकता स्थापित करने वाले सच्चे भारत बंधु हैं।
- अरविंद।
हृदय की कोई भाषा नहीं है, हृदय-हृदय से बातचीत करता है।
- महात्मा गांधी।
मेरा आग्रहपूर्वक कथन है कि अपनी सारी मानसिक शक्ति हिन्दी के अध्ययन में लगावें।
- विनोबा भावे।
साहित्यिक इस बात को कभी न भूले कि एक ख्याल ही क्रिया का स्वामी है, उसे बढ़ाने, घटाने या ठुकरा देनेवाला।
- माखनलाल चतुर्वेदी।
एशिया के कितने ही राष्ट्र आज यूरोपीय राष्ट्रों के चंगुल से छूट गए हैं पर उनकी आर्थिक दासता आज भी टिकी हुई है।
- वी. सी. जोशी।
हिंदी द्वारा सारे भारत को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है।
- स्वामी दयानंद।
इस पथ का उद्देश्य नहीं है, श्रांत भवन में टिक रहना।
- जयशंकर प्रसाद।
विद्या अच्छे दिनों में आभूषण है, विपत्ति में सहायक और बुढ़ापे में संचित सामग्री है।
- अरस्तु।
अधिक अनुभव, अधिक विपत्ति सहना, और अधिक अध्ययन, ये ही विद्वता के तीन स्तंभ हैं।
- डिजरायली।
जैसे-जैसे हमारे देश में राष्ट्रीयता का भाव बढ़ता जायेगा वैसे ही वैसे हिंदी की राष्ट्रीय सत्ता भी बढ़ेगी।
- श्रीमती लोकसुन्दरी रामन् ।
शब्दे मारिया मर गया शब्दे छोड़ा राज। जे नर शब्द पिछानिया ताका सरिया काज।
- कबीर।
यदि स्वदेशाभिमान सीखना है तो मछली से जो स्वदेश (पानी) के लिये तड़प-तड़पकर जान दे देती है।
- सुभाषचन्द्र बसु।
प्रसिद्धि का भीतरी अर्थ यशविस्तार नहीं, विषय पर अच्छी सिद्धि पाना है।
- सूर्यकांत त्रिपाठी निराला।
सरस्वती से श्रेष्ठ कोई वैद्य नहीं और उसकी साधना से बढ़कर कोई दवा नहीं है।
- एक जपानी सूक्ति।
संस्कृत प्राकृत से संबंध विच्छेद कदापि श्रेयस्कर नहीं। - यशेदानंदन अखौरी।
राष्ट्रीय व्यवहार में हिंदी को काम में लाना देश की शीघ्र उन्नति के लिये आवश्यक है।
- महात्मा गांधी।
शिक्षा का प्रचार और विद्या की उन्नति इसलिये अपेक्षित है कि जिससे हमारे -स्वत्व का रक्षण हो।
- माधवराव सप्रे।
विधान भी स्याही का एक बिन्दु गिराकर भाग्यलिपि पर कालिमा चढ़ा देता है।
- जयशंकर प्रसाद।
जीवित भाषा बहती नदी है जिसकी धारा नित्य एक ही मार्ग से प्रवाहित नहीं होती।
- बाबूराव विष्णु पराड़कर।
वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।
- मैथिलीशरण गुप्त।
हिन्दी उन सभी गुणों से अलंकृत है जिनके बल पर वह विश्व की साहित्यिक भाषाओं की अगली श्रेणी में सभासीन हो सकती है।
- मैथिलीशरण गुप्त।
पराधीनता की विजय से स्वाधीनता की पराजय सहस्त्र गुना अच्छी है।
- अज्ञात।
कलाकार अपनी प्रवृत्तियों से भी विशाल हैं। उसकी भावराशि अथाह और अचिंत्य है।
- मैक्सिम गोर्की।
कला का सत्य जीवन की परिधि में सौन्दर्य के माध्यम द्वारा व्यक्त अखंड सत्य है।
- महादेवी वर्मा।
क्षण प्रति-क्षण जो नवीन दिखाई पड़े वही रमणीयता का उत्कृष्ट रूप है।
- माघ।
प्रसन्नता न हमारे अंदर है न बाहर वरन् वह हमारा ईश्वर के साथ ऐक्य है।
- पास्कल।
हिन्दी भाषा और साहित्य ने तो जन्म से ही अपने पैरों पर खड़ा होना सीखा है।
- धीरेन्द्र वर्मा।
साहित्यकार एक दीपक के समान है जो जलकर केवल दूसरों को ही प्रकाश देता है।
- अज्ञात।
बिना मातृभाषा की उन्नति के देश का गौरव कदापि वृद्धि को प्राप्त नहीं हो सकता।
- गोविन्द शास्त्री दुगवेकर।
विधाता कर्मानुसार संसार का निर्माण करता है किन्तु साहित्यकार इस प्रकार के बंधनों से ऊपर है।
- बागीश्वरजी।
श्रद्धा महत्व की आनंदपूर्ण स्वीकृति के साथ-साथ पूज्य बुद्धि का संचार है।
- रामचंद्र शुक्ल।
कविता सुखी और उत्तम मनुष्यों के उत्तम और सुखमय क्षणों का उद्गार है।
- शेली।
भय ही पराधीनता है, निर्भयता ही स्वराज्य है।
- प्रेमचंद।
वास्तविक महान् व्यक्ति तीन बातों द्वारा जाना जाता है-योजना में उदारता, उसे पूरी करने में मनुष्यता और सफलता में संयम।
- बिस्मार्क।
रमणीय अर्थ का प्रतिपादन करने वाले शब्द का नाम काव्य है।
- पंडितराज जगन्नाथ।
प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है।
- रामचंद्र शुक्ल।
अंग्रेजी को भारतीय भाषा बनाने का यह अभिप्राय है कि हम अपने भारतीय अस्तित्व को बिल्कुल मिटा दें।
- पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार।
अंग्रेजी का मुखापेक्षी रहना भारतीयों को किसी प्रकार से शोभा नहीं देता है।
- भास्कर गोविन्द धाणेकर।
यह हमारा दुर्भाग्य है कि हमारी शिक्षा विदेशी भाषा में होती है और मातृभाषा में नहीं होती।
- माधवराव सप्रे।
भाषा ही राष्ट्र का जीवन है।
- पुरुषोत्तमदास टंडन।
कविता मानवता की उच्चतम अनुभूति की अभिव्यक्ति है।
- हजारी प्रसाद द्विवेदी।
हिंदी स्वयं अपनी ताकत से बढ़ेगी।
- पं. नेहरू।
भाषा विचार की पोशाक है।
- डॉ. जोनसन।
हमारी देवनागरी इस देश की ही नहीं समस्त संसार की लिपियों में सबसे अधिक वैज्ञानिक है।
- सेठ गोविन्ददास।
अंग्रेजी के माया मोह से हमारा आत्मविश्वास ही नष्ट नहीं हुआ है, बल्कि हमारा राष्ट्रीय स्वाभिमान भी पददलित हुआ है।
- लक्ष्मीनारायण सिंह सुधांशु।
आइए हम आप एकमत हो कोई ऐसा उपाय करें जिससे राष्ट्रभाषा का प्रचार घर-घर हो जाये और राष्ट्र का कोई भी कोना अछूता न रहे।
- चन्द्रबली पांडेय।
जैसे जन्मभूमि जगदम्बा का स्वरूप है वैसे ही मातृभाषा भी जगदम्बा का स्वरूप है।
- गोविन्द शास्त्री दुगवेकर।
हिंदी और उर्दू की जड़ एक है, रूपरेखा एक है और दोनों को अगर हम चाहें तो एक बना सकते हैं।
- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद।
हिंदी आज साहित्य के विचार से रूढ़ियों से बहुत आगे है। विश्वसाहित्य में ही जानेवाली रचनाएँ उसमें हैं। - सूर्यकांत त्रिपाठी निराला।
भारत की रक्षा तभी हो सकती है जब इसके साहित्य, इसकी सभ्यता तथा इसके आदर्शों की रक्षा हो।
- पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार।
हिंदी संस्कृत की बेटियों में सबसे अच्छी और शिरोमणि है।
- ग्रियर्सन।
मैं नहीं समझता, सात समुन्दर पार की अंग्रेजी का इतना अधिकार यहाँ कैसे हो गया।
- महात्मा गांधी।
मेरे लिये हिन्दी का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है।
- राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन।
संस्कृत को छोड़कर आज भी किसी भी भारतीय भाषा का वाङ्मय विस्तार या मौलिकता में हिन्दी के आगे नहीं जाता।
- डॉ. सम्पूर्णानन्द।
उर्दू और हिंदी दोनों को मिला दो। अलग-अलग नाम नहीं होना चाहिए। - मौलाना मुहम्मद अली।
राष्ट्रभाषा के विषय में यह बात ध्यान में रखनी होगी कि यह राष्ट्र के सब प्रान्तों की समान और स्वाभाविक राष्ट्रभाषा है। - लक्ष्मण नारायण गर्दे।
प्रसन्नता न हमारे अंदर है न बाहर वरन् वह हमारा ईश्वर के साथ ऐक्य है।
- पास्कल।
विदेशी भाषा के शब्द, उसके भाव तथा दृष्टांत हमारे हृदय पर वह प्रभाव नहीं डाल सकते जो मातृभाषा के चिरपरिचित तथा हृदयग्राही वाक्य।
- मन्नन द्विवेदी।
जातीय भाव हमारी अपनी भाषा की ओर झुकता है।
- शारदाचरण मित्र।
हिंदी अपनी भूमि की अधिष्ठात्री है।
- राहुल सांकृत्यायन।
सारा शरीर अपना, रोम-रोम अपने, रंग और रक्त अपना, अंग प्रत्यंग अपने, किन्तु जुबान दूसरे की, यह कहाँ की सभ्यता और कहाँ की मनुष्यता है।
- रणवीर सिंह जी।
वाणी, सभ्यता और देश की रक्षा करना सच्चा यज्ञ है।
- ठाकुरदत्त शर्मा।
हिन्दी व्यापकता में अद्वितीय है।
- अम्बिका प्रसाद वाजपेयी।
हमारी राष्ट्रभाषा की पावन गंगा में देशी और विदेशी सभी प्रकार के शब्द मिलजुलकर एक हो जायेंगे।
- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद।
नागरी की वर्णमाला है विशुद्ध महान, सरल सुन्दर सीखने में सुगम अति सुखदान।
- मिश्रबंधु।
साहित्य ही हमारा जीवन है।
- डॉ. भगवानदास।
मनुष्य सदा अपनी भातृभाषा में ही विचार करता है।
- मुकुन्दस्वरूप वर्मा।
बिना भाषा की जाति नहीं शोभा पाती है। और देश की मार्यादा भी घट जाती है।
- माधव शुक्ल।
हिंदी और उर्दू एक ही भाषा के दो रूप हैं और दोनों रूपों में बहुत साहित्य है।
- अंबिका प्रसाद वाजपेयी।
हम हिन्दी वालों के हृदय में किसी सम्प्रदाय या किसी भाषा से रंचमात्र भी ईर्ष्या, द्वेष या घृणा नहीं है।
- शिवपूजन सहाय।
भारत के विभिन्न प्रदेशों के बीच हिन्दी प्रचार द्वारा एकता स्थापित करने वाले सच्चे भारत बंधु हैं।
- अरविंद।
राष्ट्रीय एकता के लिये हमें प्रांतीयता की भावना त्यागकर सभी प्रांतीय भाषाओं के लिए एक लिपि देवनागरी अपना लेनी चाहिये।
- शारदाचरण मित्र (जस्टिस)।
समूचे राष्ट्र को एकताबद्ध और दृढ़ करने के लिए हिन्द भाषी जाति की एकता आवश्यक है।
- रामविलास शर्मा।
हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनने के हेतु हुए अनुष्ठान को मैं संस्कृति का राजसूय यज्ञ समझता हूँ। - आचार्य क्षितिमोहन सेन।
हिन्दी का भविष्य उज्ज्वल है, इसमें कोई संदेह नहीं।
- अनंत गोपाल शेवड़े।
अरबी लिपि भारतीय लिपि होने योग्य नहीं।
- सैयदअली बिलग्रामी।
हिन्दी को ही राजभाषा का आसन देना चाहिए।
- शचींद्रनाथ बख्शी।
अंतरप्रांतीय व्यवहार में हमें हिन्दी का प्रयोग तुरंत शुरू कर देना चाहिए।
- र. रा. दिवाकर।
हिन्दी का शासकीय प्रशासकीय क्षेत्रों से प्रचार न किया गया तो भविष्य अंधकारमय हो सकता है। - विनयमोहन शर्मा।
अंग्रेजी इस देश के लिए अभिशाप है, यह हर साल हमारे सामने प्रकट होता है, फिर भी उसे हम पूतना न मानकर चामुण्डमर्दिनी दुर्गा मान रहे हैं।
- अवनींद्र कुमार विद्यालंकार।
हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने में प्रांतीय भाषाओं को हानि नहीं वरन् लाभ होगा।
- अनंतशयनम् आयंगार।
संस्कृत के अपरिमित कोश से हिन्दी शब्दों की सब कठिनाइयाँ सरलता से हल कर लेगी।
- राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन।
(अंग्रेजी ने) हमारी परम्पराएँ छिन्न-भिन्न करके, हमें जंगली बना देने का भरसक प्रयत्न किया।
- अमृतलाल नागर।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल ।
अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन
पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन ।
उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय
निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय ।
निज भाषा उन्नति बिना, कबहुं न ह्यैहैं सोय
लाख उपाय अनेक यों भले करे किन कोय ।
इक भाषा इक जीव इक मति सब घर के लोग
तबै बनत है सबन सों, मिटत मूढ़ता सोग ।
और एक अति लाभ यह, या में प्रगट लखात
निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात ।
तेहि सुनि पावै लाभ सब, बात सुनै जो कोय
यह गुन भाषा और महं, कबहूं नाहीं होय ।
विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार
सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार ।
भारत में सब भिन्न अति, ताहीं सों उत्पात
विविध देस मतहू विविध, भाषा विविध लखात ।
सब मिल तासों छांड़ि कै, दूजे और उपाय
उन्नति भाषा की करहु, अहो भ्रातगन आय ।
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राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है।
- अवनींद्रकुमार विद्यालंकार।
हिंदी का काम देश का काम है, समूचे राष्ट्रनिर्माण का प्रश्न है।
- बाबूराम सक्सेना।
समस्त भारतीय भाषाओं के लिए यदि कोई एक लिपि आवश्यक हो तो वह देवनागरी ही हो सकती है। - (जस्टिस) कृष्णस्वामी अय्यर।
हिंदी का पौधा दक्षिणवालों ने त्याग से सींचा है। - शंकरराव कप्पीकेरी।
अकबर से लेकर औरंगजेब तक मुगलों ने जिस देशभाषा का स्वागत किया वह ब्रजभाषा थी, न कि उर्दू। -रामचंद्र शुक्ल।
राष्ट्रभाषा हिंदी का किसी क्षेत्रीय भाषा से कोई संघर्ष नहीं है। - अनंत गोपाल शेवड़े।
दक्षिण की हिंदी विरोधी नीति वास्तव में दक्षिण की नहीं, बल्कि कुछ अंग्रेजी भक्तों की नीति है।
- के.सी. सारंगमठ।
हिंदी ही भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है।
- वी. कृष्णस्वामी अय्यर।
राष्ट्रीय एकता की कड़ी हिंदी ही जोड़ सकती है।
- बालकृष्ण शर्मा नवीन।
विदेशी भाषा का किसी स्वतंत्र राष्ट्र के राजकाज और शिक्षा की भाषा होना सांस्कृतिक दासता है।
- वाल्टर चेनिंग।
हिंदी को तुरंत शिक्षा का माध्यम बनाइये।
- बेरिस कल्यएव।
अंग्रेजी सर पर ढोना डूब मरने के बराबर है।
- सम्पूर्णानंद।
एखन जतोगुलि भाषा भारते प्रचलित आछे ताहार मध्ये भाषा सर्वत्रइ प्रचलित।
- केशवचंद्र सेन।
देश को एक सूत्र में बाँधे रखने के लिए एक भाषा की आवश्यकता है।
- सेठ गोविंददास।
इस विशाल प्रदेश के हर भाग में शिक्षित-अशिक्षित, नागरिक और ग्रामीण सभी हिंदी को समझते हैं।
- राहुल सांकृत्यायन।
समस्त आर्यावर्त या ठेठ हिंदुस्तान की राष्ट्र तथा शिष्ट भाषा हिंदी या हिंदुस्तानी है।
-सर जार्ज ग्रियर्सन।
मुस्लिम शासन में हिंदी फारसी के साथ-साथ चलती रही पर कंपनी सरकार ने एक ओर फारसी पर हाथ साफ किया तो दूसरी ओर हिंदी पर।
- चंद्रबली पांडेय।
भारत की परंपरागत राष्ट्रभाषा हिंदी है। - नलिनविलोचन शर्मा।
जब से हमने अपनी भाषा का समादर करना छोड़ा तभी से हमारा अपमान और अवनति होने लगी। - (राजा) राधिकारमण प्रसाद सिंह।
यदि पक्षपात की दृष्टि से न देखा जाये तो उर्दू भी हिंदी का ही एक रूप है।
- शिवनंदन सहाय।
प्रत्येक नगर प्रत्येक मोहल्ले में और प्रत्येक गाँव में एक पुस्तकालय होने की आवश्यकता है।
- (राजा) कीर्त्यानंद सिंह।
अपनी सरलता के कारण हिंदी प्रवासी भाइयों की स्वत: राष्ट्रभाषा हो गई।
- भवानीदयाल संन्यासी।
यह कैसे संभव हो सकता है कि अंग्रेजी भाषा समस्त भारत की मातृभाषा के समान हो जाये?
- चंद्रशेखर मिश्र।
साहित्य की उन्नति के लिए सभाओं और पुस्तकालयों की अत्यंत आवश्यकता है।
- महामहो. पं. सकलनारायण शर्मा।
जो साहित्य केवल स्वप्नलोक की ओर ले जाये, वास्तविक जीवन को उपकृत करने में असमर्थ हो, वह नितांत महत्वहीन है। - (डॉ.) काशीप्रसाद जायसवाल।
भारतीय एकता के लक्ष्य का साधन हिंदी भाषा का प्रचार है।
- टी. माधवराव।
हिंदी हिंद की, हिंदियों की भाषा है।
- र. रा. दिवाकर।
यह संदेह निर्मूल है कि हिंदीवाले उर्दू का नाश चाहते हैं।
- राजेन्द्र प्रसाद।
उर्दू जबान ब्रजभाषा से निकली है।
- मुहम्मद हुसैन आजाद।
समाज और राष्ट्र की भावनाओं को परिमार्जित करने वाला साहित्य ही सच्चा साहित्य है।
- जनार्दनप्रसाद झाद्विज।
मजहब को यह मौका न मिलना चाहिए कि वह हमारे साहित्यिक, सामाजिक, सभी क्षेत्रों में टाँग अड़ाए। - राहुल सांकृत्यायन।
शिक्षा के प्रसार के लिए नागरी लिपि का सर्वत्र प्रचार आवश्यक है।
- शिवप्रसाद सितारेहिंद।
हमारी हिंदी भाषा का साहित्य किसी भी दूसरी भारतीय भाषा से किसी अंश से कम नहीं है।
- (रायबहादुर) रामरणविजय सिंह।
वही भाषा जीवित और जाग्रत रह सकती है जो जनता का ठीक-ठीक प्रतिनिधित्व कर सके।
- पीर मुहम्मद मूनिस।
भारतेंदु और द्विवेदी ने हिंदी की जड़ पाताल तक पहँुचा दी है; उसे उखाड़ने का जो दुस्साहस करेगा वह निश्चय ही भूकंपध्वस्त होगा। - शिवपूजन सहाय।
चक्कवै दिली के अथक्क अकबर सोऊ, नरहर पालकी को आपने कँधा करै।
- बेनी कवि।
यह निर्विवाद है कि हिंदुओं को उर्दू भाषा से कभी द्वेष नहीं रहा। - ब्रजनंदन दास।
देहात का विरला ही कोई मुसलमान प्रचलित उर्दू भाषा के दस प्रतिशत शब्दों को समझ पाता है।
- साँवलिया बिहारीलाल वर्मा।
हिंदी भाषा अपनी अनेक धाराओं के साथ प्रशस्त क्षेत्र में प्रखर गति से प्रकाशित हो रही है।
- छविनाथ पांडेय।
देवनागरी ध्वनिशास्त्र की दृष्टि से अत्यंत वैज्ञानिक लिपि है।
- रविशंकर शुक्ल।
हमारी नागरी दुनिया की सबसे अधिक वैज्ञानिक लिपि है।
- राहुल सांकृत्यायन।
नागरी प्रचार देश उन्नति का द्वार है।
- गोपाललाल खत्री।
साहित्य का स्रोत जनता का जीवन है।
- गणेशशंकर विद्यार्थी।
अंग्रेजी से भारत की रक्षा नहीं हो सकती।
- पं. कृ. पिल्लयार।
उसी दिन मेरा जीवन सफल होगा जिस दिन मैं सारे भारतवासियों के साथ शुद्ध हिंदी में वार्तालाप करूँगा। - शारदाचरण मित्र।
हिंदी के ऊपर आघात पहुँचाना हमारे प्राणधर्म पर आघात पहुँचाना है।
- जगन्नाथप्रसाद मिश्र।
हिंदी जाननेवाला व्यक्ति देश के किसी कोने में जाकर अपना काम चला लेता है।
- देवव्रत शास्त्री।
हिंदी और नागरी का प्रचार तथा विकास कोई भी रोक नहीं सकता।
- गोविन्दवल्लभ पंत।
भारत की सारी प्रांतीय भाषाओं का दर्जा समान है।
- रविशंकर शुक्ल।
किसी साहित्य की नकल पर कोई साहित्य तैयार नहीं होता।
- सूर्यकांत त्रिपाठी निराला।
हार सरोज हिए है लसै मम ऐसी गुनागरी नागरी होय।
- ठाकुर त्रिभुवननाथ सिंह।
भाषा ही से हृदयभाव जाना जाता है। शून्य किंतु प्रत्यक्ष हुआ सा दिखलाता है।
- माधव शुक्ल।
संस्कृत मां, हिंदी गृहिणी और अंग्रेजी नौकरानी है।
- डॉ. फादर कामिल बुल्के।
भाषा विचार की पोशाक है।
- डॉ. जानसन।
रामचरित मानस हिंदी साहित्य का कोहनूर है।
- यशोदानंदन अखौरी।
साहित्य के हर पथ पर हमारा कारवाँ तेजी से बढ़ता जा रहा है। - रामवृक्ष बेनीपुरी।
कवि संमेलन हिंदी प्रचार के बहुत उपयोगी साधन हैं।
- श्रीनारायण चतुर्वेदी।
हिंदी चिरकाल से ऐसी भाषा रही है जिसने मात्र विदेशी होने के कारण किसी शब्द का बहिष्कार नहीं किया।
- राजेंद्रप्रसाद।
देवनागरी अक्षरों का कलात्मक सौंदर्य नष्ट करना कहाँ की बुद्धिमानी है
? - शिवपूजन सहाय।
जिस देश को अपनी भाषा और अपने साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता।
- देशरत्न डॉ. राजेन्द्रप्रसाद।
कविता कामिनि भाल में हिंदी बिंदी रूप, प्रकट अग्रवन में भई ब्रज के निकट अनूप।
- राधाचरण गोस्वामी।
हिंदी समस्त आर्यावर्त की भाषा है।
- शारदाचरण मित्र।
हिंदी भारतीय संस्कृति की आत्मा है।
- कमलापति त्रिपाठी।
मैं उर्दू को हिंदी की एक शैली मात्र मानता।
- मनोरंजन प्रसाद।
हिंदी भाषा को भारतीय जनता तथा संपूर्ण मानवता के लिये बहुत बड़ा उत्तरदायित्व सँभालना है। - सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या।
नागरीप्रचारिणी सभा, काशी की हीरकजयंती के पावन अवसर पर उपस्थित न हो सकने का मुझे बड़ा खेद है। - (प्रो.) तान युन् शान।
राष्ट्रभाषा हिंदी हो जाने पर भी हमारे व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन पर विदेशी भाषा का प्रभुत्व अत्यंत गर्हित बात है।
- कमलापति त्रिपाठी।
सभ्य संसार के सारे विषय हमारे साहित्य में आ जाने की ओर हमारी सतत् चेष्टा रहनी चाहिए।
- श्रीधर पाठक।
भारतवर्ष के लिए हिंदी भाषा ही सर्वसाधरण की भाषा होने के उपयुक्त है।
- शारदाचरण मित्र।
हिंदी भाषा और साहित्य ने तो जन्म से ही अपने पैरों पर खड़ा होना सीखा है।
- धीरेन्द्र वर्मा।
जब हम अपना जीवन, जननी हिंदी, मातृभाषा हिंदी के लिये समर्पण कर दे तब हम किसी के प्रेमी कहे जा सकते हैं।
- सेठ गोविंददास।
कविता सुखी और उत्तम मनुष्यों के उत्तम और सुखमय क्षणों का उद्गार है।
- शेली।
भाषा की समस्या का समाधान सांप्रदायिक दृष्टि से करना गलत है।
- लक्ष्मीनारायण सुधांशु।
भारतीय साहित्य और संस्कृति को हिंदी की देन बड़ी महत्त्वपूर्ण है।
- सम्पूर्णानन्द।
हिंदी के पुराने साहित्य का पुनरुद्धार प्रत्येक साहित्यिक का पुनीत कर्तव्य है।
- पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल।
परमात्मा से प्रार्थना है कि हिंदी का मार्ग निष्कंटक करें
। - हरगोविंद सिंह।
अहिंदी भाषा-भाषी प्रांतों के लोग भी सरलता से टूटी-फूटी हिंदी बोलकर अपना काम चला लेते हैं। - अनंतशयनम् आयंगार।
वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।
- मैथिलीशरण गुप्त।
दाहिनी हो पूर्ण करती है अभिलाषा पूज्य हिंदी भाषा हंसवाहिनी का अवतार है
। - अज्ञात।
वास्तविक महान् व्यक्ति तीन बातों द्वारा जाना जाता है- योजना में उदारता, उसे पूरा करने में मनुष्यता और सफलता में संयम।
- बिस्मार्क।
हिंदुस्तान की भाषा हिंदी है और उसका दृश्यरूप या उसकी लिपि सर्वगुणकारी नागरी ही है
। - गोपाललाल खत्री।
कविता मानवता की उच्चतम अनुभूति की अभिव्यक्ति है।
- हजारी प्रसाद द्विवेदी।
हिंदी ही के द्वारा अखिल भारत का राष्ट्रनैतिक ऐक्य सुदृढ़ हो सकता है।
- भूदेव मुखर्जी।
हिंदी का शिक्षण भारत में अनिवार्य ही होगा।
- सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या।
हिंदी, नागरी और राष्ट्रीयता अन्योन्याश्रित है।
- नन्ददुलारे वाजपेयी।
अकबर की सभा में सूर के जसुदा बार-बार यह भाखै पद पर बड़ा स्मरणीय विचार हुआ था।
- राधाचरण गोस्वामी।
देशभाषा की उन्नति से ही देशोन्नति होती है। - सुधाकर द्विवेदी।
हिंदी साहित्य धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष इस चतु:पुरुषार्थ का साधक अतएव जनोपयोगी।
- (डॉ.) भगवानदास।
हिंदी उन सभी गुणों से अलंकृत है जिनके बल पर वह विश्व की साहित्यिक भाषाओं की अगली श्रेणी में सभासीन हो सकती है।
- मैथिलीशरण गुप्त।
वाणी, सभ्यता और देश की रक्षा करना सच्चा धर्म यज्ञ है।
- ठाकुरदत्त शर्मा।
निष्काम कर्म ही सर्वोत्तम कार्य है, जो तृप्ति प्रदाता है और व्यक्ति और समाज की शक्ति बढ़ाता है।
- पंडित सुधाकर पांडेय।
अब हिंदी ही माँ भारती हो गई है- वह सबकी आराध्य है, सबकी संपत्ति है।
- रविशंकर शुक्ल।
बच्चों को विदेशी लिपि की शिक्षा देना उनको राष्ट्र के सच्चे प्रेम से वंचित करना है।
- भवानीदयाल संन्यासी।
यहाँ (दिल्ली) के खुशबयानों ने मताहिद (गिनी चुनी) जबानों से अच्छे अच्छे लफ्ज निकाले और बाजे इबारतों और अल्फाज में तसर्रूफ (परिवर्तन) करके एक नई जवान पैदा की जिसका नाम उर्दू रखा है।
- दरियाये लताफत।
भाषा और राष्ट्र में बड़ा घनिष्ट संबंध है।
- (राजा) राधिकारमण प्रसाद सिंह।
अगर उर्दूवालों की नीति हिंदी के बहिष्कार की न होती तो आज लिपि के सिवा दोनों में कोई भेद न पाया जाता।
- देशरत्न डॉ. राजेंद्रप्रसाद।
हिंदी भाषा की उन्नति का अर्थ है राष्ट्र और जाति की उन्नति।
- रामवृक्ष बेनीपुरी।
बाजारवाली बोली विश्वविद्यालयों में काम नहीं दे सकती।
- संपूर्णानंद।
भारतेंदु का साहित्य मातृमंदिर की अर्चना का साहित्य है।
- बदरीनाथ शर्मा।
तलवार के बल से न कोई भाषा चलाई जा सकती है न मिटाई।
- शिवपूजन सहाय।
अखिल भारत के परस्पर व्यवहार के लिये ऐसी भाषा की आवश्यकता है जिसे जनता का अधिकतम भाग पहले से ही जानता समझता है।
- महात्मा गाँधी।
हिंदी को राजभाषा करने के बाद पूरे पंद्रह वर्ष तक अंग्रेजी का प्रयोग करना पीछे कदम हटाना है।- राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन।
भाषा राष्ट्रीय शरीर की आत्मा है।
- स्वामी भवानीदयाल संन्यासी।
हिंदी के राष्ट्रभाषा होने से जहाँ हमें हर्षोल्लास है, वहीं हमारा उत्तरदायित्व भी बहुत बढ़ गया है।
- मथुरा प्रसाद दीक्षित।
भारतवर्ष में सभी विद्याएँ सम्मिलित परिवार के समान पारस्परिक सद्भाव लेकर रहती आई हैं।
- रवींद्रनाथ ठाकुर।
इतिहास को देखते हुए किसी को यह कहने का अधिकारी नहीं कि हिंदी का साहित्य जायसी के पहले का नहीं मिलता।
- (डॉ.) काशीप्रसाद जायसवाल।
संप्रति जितनी भाषाएं भारत में प्रचलित हैं उनमें से हिंदी भाषा प्राय: सर्वत्र व्यवहृत होती है।
- केशवचंद्र सेन।
हिंदी ने राष्ट्रभाषा के पद पर सिंहानसारूढ़ होने पर अपने ऊपर एक गौरवमय एवं गुरुतर उत्तरदायित्व लिया है। - गोविंदबल्लभ पंत।
हिंदी जिस दिन राजभाषा स्वीकृत की गई उसी दिन से सारा राजकाज हिंदी में चल सकता था।
- सेठ गोविंददास।
हिंदी भाषी प्रदेश की जनता से वोट लेना और उनकी भाषा तथा साहित्य को गालियाँ देना कुछ नेताओं का दैनिक व्यवसाय है।
- (डॉ.) रामविलास शर्मा।
जब एक बार यह निश्चय कर लिया गया कि सन् १९६५ से सब काम हिंदी में होगा, तब उसे अवश्य कार्यान्वित करना चाहिए।
- सेठ गोविंददास।
साहित्यसेवा और धर्मसाधना पर्यायवायी है।
- (म. म.) सत्यनारायण शर्मा।
जिसका मन चाहे वह हिंदी भाषा से हमारा दूर का संबंध बताये, मगर हम बिहारी तो हिंदी को ही अपनी भाषा, मातृभाषा मानते आए हैं।
- शिवनंदन सहाय।
उर्दू का ढाँचा हिंदी है, लेकिन सत्तर पचहत्तर फीसदी उधार के शब्दों से उर्दू दाँ तक तंग आ गए हैं।
- राहुल सांकृत्यायन।
मानस भवन में आर्यजन जिसकी उतारें आरती। भगवान भारतवर्ष में गूँजे हमारी भारती।
- मैथिलीशरण गुप्त।
गद्य जीवनसंग्राम की भाषा है। इसमें बहुत कार्य करना है, समय थोड़ा है।
- सूर्यकांत त्रिपाठी निराला।
अंग्रेजी हमें गूँगा और कूपमंडूक बना रही है।
- ब्रजभूषण पांडेय।
लाखों की संख्या में छात्रों की उस पलटन से क्या लाभ जिनमें अंग्रेजी में एक प्रार्थनापत्र लिखने की भी क्षमता नहीं है। - कंक।
मैं राष्ट्र का प्रेम, राष्ट्र के भिन्न-भिन्न लोगों का प्रेम और राष्ट्रभाषा का प्रेम, इसमें कुछ भी फर्क नहीं देखता। - र. रा. दिवाकर।
देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता स्वयं सिद्ध है।
- महावीर प्रसाद द्विवेदी।
हिमालय से सतपुड़ा और अंबाला से पूर्णिया तक फैला हुआ प्रदेश हिंदी का प्रकृत प्रांत है।
- राहुल सांकृत्यायन।
किसी राष्ट्र की राजभाषा वही भाषा हो सकती है जिसे उसके अधिकाधिक निवासी समझ सके।
- (आचार्य) चतुरसेन शास्त्री।
साहित्य के इतिहास में काल विभाजन के लिए तत्कालीन प्रवृत्तियों को ही मानना न्यायसंगत है।
- अंबाप्रसाद सुमन।
हिंदी भाषा हमारे लिये किसने बनाया? प्रकृति ने। हमारे लिये हिंदी प्रकृतिसिद्ध है।
- पं. गिरिधर शर्मा।
हिंदी भाषा उस समुद्र जलराशि की तरह है जिसमें अनेक नदियाँ मिली हों।
- वासुदेवशरण अग्रवाल।
भाषा देश की एकता का प्रधान साधन है।
- (आचार्य) चतुरसेन शास्त्री।
क्रांतदर्शी होने के कारण ऋषि दयानंद ने देशोन्नति के लिये हिंदी भाषा को अपनाया था।
- विष्णुदेव पौद्दार।
सच्चा राष्ट्रीय साहित्य राष्ट्रभाषा से उत्पन्न होता है।
- वाल्टर चेनिंग।
हिंदी के पौधे को हिंदू मुसलमान दोनों ने सींचकर बड़ा किया है।
- जहूरबख्श।
किसी लफ्ज के उर्दू न होने से मुराद है कि उर्दू में हुरूफ की कमी बेशी से वह खराद पर नहीं चढ़ा।
- सैयद इंशा अल्ला खाँ।
अंग्रेजी का पद चिरस्थायी करना देश के लिये लज्जा की बात है
- संपूर्णानंद।
हिंदी राष्ट्रभाषा है, इसलिये प्रत्येक व्यक्ति को, प्रत्येक भारतवासी को इसे सीखना चाहिए।
- रविशंकर शुक्ल।
हिंदी प्रांतीय भाषा नहीं बल्कि वह अंत:प्रांतीय राष्ट्रीय भाषा है।
- छविनाथ पांडेय।
साहित्य को उच्च अवस्था पर ले जाना ही हमारा परम कर्तव्य है।
- पार्वती देवी।
विश्व की कोई भी लिपि अपने वर्तमान रूप में नागरी लिपि के समान नहीं।
- चंद्रबली पांडेय।
भाषा की एकता जाति की एकता को कायम रखती है।
- राहुल सांकृत्यायन।
जिस राष्ट्र की जो भाषा है उसे हटाकर दूसरे देश की भाषा को सारी जनता पर नहीं थोपा जा सकता - वासुदेवशरण अग्रवाल।
पराधीनता की विजय से स्वाधीनता की पराजय सहस्रगुना अच्छी है।
- अज्ञात।
समाज के अभाव में आदमी की आदमियत की कल्पना नहीं की जा सकती।
- पं. सुधाकर पांडेय।
तुलसी, कबीर, नानक ने जो लिखा है, उसे मैं पढ़ता हूँ तो कोई मुश्किल नहीं आती।
- मौलाना मुहम्मद अली।
भाषा का निर्माण सेक्रेटरियट में नहीं होता, भाषा गढ़ी जाती है जनता की जिह्वा पर।
- रामवृक्ष बेनीपुरी।
हिंदी भाषी ही एक ऐसी भाषा है जो सभी प्रांतों की भाषा हो सकती है। - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार।
जब हम हिंदी की चर्चा करते हैं तो वह हिंदी संस्कृति का एक प्रतीक होती है।
- शांतानंद नाथ।
भारतीय धर्म की है घोषणा घमंड भरी, हिंदी नहीं जाने उसे हिंदू नहीं जानिए।
- नाथूराम शंकर शर्मा।
राजनीति के चिंतापूर्ण आवेग में साहित्य की प्रेरणा शिथिल नहीं होनी चाहिए।
- राजकुमार वर्मा।
हिंदी में जो गुण है उनमें से एक यह है कि हिंदी मर्दानी जबान है।
- सुनीति कुमार चाटुर्ज्या।
स्पर्धा ही जीवन है, उसमें पीछे रहना जीवन की प्रगति खोना है।
- निराला।
कविता हमारे परिपूर्ण क्षणों की वाणी है।
- सुमित्रानंदन पंत।
बिना मातृभाषा की उन्नति के देश का गौरव कदापि वृद्धि को प्राप्त नहीं हो सकता।
- गोविंद शास्त्री दुगवेकर।
उर्दू लिपि की अनुपयोगिता, भ्रामकता और कठोरता प्रमाणित हो चुकी है।
- रामरणविजय सिंह।
राष्ट्रभाषा राष्ट्रीयता का मुख्य अंश है। - श्रीमती सौ. चि. रमणम्मा देव।
बानी हिंदी भाषन की महरानी, चंद्र, सूर, तुलसी से जामें भए सुकवि लासानी।
- पं. जगन्नाथ चतुर्वेदी।
जय जय राष्ट्रभाषा जननि। जयति जय जय गुण उजागर राष्ट्रमंगलकरनि।
- देवी प्रसाद गुप्त।
हिंदी हमारी हिंदू संस्कृति की वाणी ही तो है।
- शांतानंद नाथ।
आज का लेखक विचारों और भावों के इतिहास की वह कड़ी है जिसके पीछे शताब्दियों की कड़ियाँ जुड़ी है।
- माखनलाल चतुर्वेदी।
विज्ञान के बहुत से अंगों का मूल हमारे पुरातन साहित्य में निहित है।
- सूर्यनारायण व्यास।
कोई कौम अपनी जबान के बगैर अच्छी तालीम नहीं हासिल कर सकती।
- सैयद अमीर अली मीर।
हिंदी और उर्दू में झगड़ने की बात ही नहीं है।
- ब्रजनंदन सहाय।
कविता हृदय की मुक्त दशा का शाब्दिक विधान है।
- रामचंद्र शुक्ल।
हमारी राष्ट्रभाषा का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीयता का दृढ़ निर्माण है।
- चंद्रबली पांडेय।
जिस शिक्षा से स्वाभिमान की वृत्ति जाग्रत नहीं होती वह शिक्षा किसी काम की नहीं।
- माधवराव सप्रे।
कालोपयोगी कार्य न कर सकने पर महापुरुष बन सकना संभव नहीं है।
- सू. च. धर।
मैं दुनिया की सब भाषाओं की इज्जत करता हूँ, परन्तु मेरे देश में हिंदी की इज्जत न हो, यह मैं नहीं सह सकता।
- विनोबा भावे।
आज का आविष्कार कल का साहित्य है।
- माखनलाल चतुर्वेदी।
भाषा के सवाल में मजहब को दखल देने का कोई हक नहीं।
- राहुल सांकृत्यायन।
जब तक संघ शक्ति उत्पन्न न होगी तब तक प्रार्थना में कुछ जान नहीं हो सकती। - माधव राव सप्रे।
हिंदी विश्व की महान भाषा है।
- राहुल सांकृत्यायन।
राष्ट्रीय एकता के लिये एक भाषा से कहीं बढ़कर आवश्यक एक लिपि का प्रचार होना है।
- ब्रजनंदन सहाय।
जो ज्ञान तुमने संपादित किया है उसे वितरित करते रहो ओर सबको ज्ञानवान बनाकर छोड़ो।
- संत रामदास।
पाँच मत उधर और पाँच मत इधर रहने से श्रेष्ठता नहीं आती।
- माखनलाल चतुर्वेदी।
मैं मानती हूँ कि हिंदी प्रचार से राष्ट्र का ऐक्य जितना बढ़ सकता है वैसा बहुत कम चीजों से बढ़ सकेगा।
- लीलावती मुंशी।
हिंदी उर्दू के नाम को दूर कीजिए एक भाषा बनाइए। सबको इसके लिए तैयार कीजिए।
- देवी प्रसाद गुप्त।
साहित्यकार विश्वकर्मा की अपेक्षा कहीं अधिक सामर्थ्यशाली है।
- पं. वागीश्वर जी।
हिंदी भाषा और हिंदी साहित्य को सर्वांगसुंदर बनाना हमारा कर्त्तव्य है।
- डॉ. राजेंद्रप्रसाद।
हिंदी साहित्य की नकल पर कोई साहित्य तैयार नहीं होता।
- सूर्य कांत त्रिपाठी निराला।
भाषा के उत्थान में एक भाषा का होना आवश्यक है। इसलिये हिंदी सबकी साझा भाषा है।
- पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार।
यदि स्वदेशाभिमान सीखना है तो मछली से जो स्वदेश (पानी) के लिये तड़प तड़प कर जान दे देती है। - सुभाषचंद्र बसु।
पिछली शताब्दियों में संसार में जो राजनीतिक क्रांतियाँ हुई, प्राय: उनका सूत्रसंचालन उस देश के साहित्यकारों ने किया है।
- पं. वागीश्वर जी।
विजयी राष्ट्रवाद अपने आपको दूसरे देशों का शोषण कर जीवित रखना चाहता है।
- बी. सी. जोशी।
हिंदी हमारे देश और भाषा की प्रभावशाली विरासत है।
- माखनलाल चतुर्वेदी।
यदि लिपि का बखेड़ा हट जाये तो हिंदी उर्दू में कोई विवाद ही न रहे।
- बृजनंदन सहाय।
भारत सरस्वती का मुख संस्कृत है।
- म. म. रामावतार शर्मा।
साधारण कथा कहानियों तथा बालोपयोगी कविता में संस्कृत के सामासिक शब्द लाने से उनके मूल उद्देश्य की सफलता में बाधा पड़ती है।
- रघुवरप्रसाद द्विवेदी।
यदि आप मुझे कुछ देना चाहती हों तो इस पाठशाला की शिक्षा का माध्यम हमारी मातृभाषा कर दें। - एक फ्रांसीसी बालिका।
निर्मल चरित्र ही मनुष्य का शृंगार है।
- पंडित सुधाकर पांडेय।
हिंदुस्तान को छोड़कर दूसरे मध्य देशों में ऐसा कोई अन्य देश नहीं है, जहाँ कोई राष्ट्रभाषा नहीं हो।
- सैयद अमीर अली मीर।
इतिहास में जो सत्य है वही अच्छा है और जो असत्य है वही बुरा है।
- जयचंद्र विद्यालंकार।
सरलता, बोधगम्यता और शैली की दृष्टि से विश्व की भाषाओं में हिंदी महानतम स्थान रखती है।
- अमरनाथ झा।
हिंदी सरल भाषा है। इसे अनायास सीखकर लोग अपना काम निकाल लेते हैं।
- जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी।
एक भाषा का प्रचार रहने पर केवल इसी के सहारे, यदि लिपिगत भिन्नता न हो तो, अन्यान्य राष्ट्र गठन के उपकरण आ जाने संभव हो सकते हैं।
- अयोध्याप्रसाद वर्मा।
किसी भाषा की उन्नति का पता उसमें प्रकाशित हुई पुस्तकों की संख्या तथा उनके विषय के महत्व से जाना जा सकता है।
- गंगाप्रसाद अग्निहोत्री।
जीवन के छोटे से छोटे क्षेत्र में हिंदी अपना दायित्व निभाने में समर्थ है।
- पुरुषोत्तमदास टंडन।
बिहार में ऐसा एक भी गाँव नहीं है जहाँ केवल रामायण पढ़ने के लिये दस-बीस मनुष्यों ने हिंदी न सीखी हो।
- सकलनारायण पांडेय।
संस्कृत की इशाअत (प्रचार) का एक बड़ा फायदा यह होगा कि हमारी मुल्की जबान (देशभाषा) वसीअ (व्यापक) हो जायगी।
- मौलवी महमूद अली।
संसार में देश के नाम से भाषा को नाम दिया जाता है और वही भाषा वहाँ की राष्ट्रभाषा कहलाती है।
- ताराचंद्र दूबे।
सर्वसाधारण पर जितना पद्य का प्रभाव पड़ता है उतना गद्य का नहीं।
- राजा कृत्यानंद सिंह।
जो गुण साहित्य की जीवनी शक्ति के प्रधान सहायक होते हैं उनमें लेखकों की विचारशीलता प्रधान है।
- नरोत्तम व्यास।
भाषा और भाव का परिवर्तन समाज की अवस्था और आचार विचार से अधिक संबंध रखता है।
- बदरीनाथ भट्ट।
साहित्य पढ़ने से मुख्य दो बातें तो अवश्य प्राप्त होती हैं, अर्थात् मन की शक्तियों को विकास और ज्ञान पाने की लालसा।
- बिहारीलाल चौबे।
देवनागरी और बंगला लिपियों को साथ मिलाकर देखना है।
- मन्नन द्विवेदी।
है भव्य भारत ही हमारी मातृभूमि हरी भरी। हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा और लिपि है नागरी।
- मैथिलीशरण गुप्त।
संस्कृत की विरासत हिंदी को तो जन्म से ही मिली है।
- राहुल सांकृत्यायन।
कैसे निज सोये भाग को कोई सकता है जगा, जो निज भाषा-अनुराग का अंकुर नहिं उर में उगा।
- हरिऔध।
हिंदी में हम लिखें पढ़ें, हिंदी ही बोलें।
- पं. जगन्नाथप्रसाद चतुर्वेदी।
जिस वस्तु की उपज अधिक होती है उसमें से बहुत सा भाग फेंक भी दिया जाता है। ग्रंथों के लिये भी ऐसा ही हिसाब है।
- गिरजाकुमार घोष।
यह जो है कुरबान खुदा का, हिंदी करे बयान सदा का।
- अज्ञात।
क्या संसार में कहीं का भी आप एक दृष्टांत उद्धृत कर सकते हैं जहाँ बालकों की शिक्षा विदेशी भाषाओं द्वारा होती हो।
- डॉ. श्यामसुंदर दास।
बँगला वर्णमाला की जाँच से मालूम होता है कि देवनागरी लिपि से निकली है और इसी का सीधा सादा रूप है। - रमेशचंद्र दत्त।
वास्तव में वेश, भाषा आदि के बदलने का परिणाम यह होता है कि आत्मगौरव नष्ट हो जाता है, जिससे देश का जातित्व गुण मिट जाता है।
- सैयद अमीर अली मीर।
दूसरों की बोली की नकल करना भाषा के बदलने का एक कारण है।
- गिरींद्रमोहन मित्र।
समालोचना ही साहित्य मार्ग की सुंदर सड़क है।
- म. म. गिरधर शर्मा चतुर्वेदी।
नागरी वर्णमाला के समान सर्वांगपूर्ण और वैज्ञानिक कोई दूसरी वर्णमाला नहीं है।
- बाबू राव विष्णु पराड़कर।
अन्य देश की भाषा ने हमारे देश के आचार व्यवहार पर कैसा बुरा प्रभाव डाला है।
- अनादिधन वंद्योपाध्याय।
व्याकरण चाहे जितना विशाल बने परंतु भाषा का पूरा-पूरा समाधान उसमें नहीं हो सकता।
- अनंतराम त्रिपाठी।
स्वदेशप्रेम, स्वधर्मभक्ति और स्वावलंबन आदि ऐसे गुण हैं जो प्रत्येक मनुष्य में होने चाहिए।
- रामजी लाल शर्मा।
गुणवान खानखाना सदृश प्रेमी हो गए रसखान और रसलीन से हिंदी प्रेमी हो गए।
- राय देवीप्रसाद।
वैज्ञानिक विचारों के पारिभाषिक शब्दों के लिये, किसी विषय के उच्च भावों के लिये, संस्कृत साहित्य की सहायता लेना कोई शर्म की बात नहीं है।
- गणपति जानकीराम दूबे।
हिंदुस्तान के लिये देवनागरी लिपि का ही व्यवहार होना चाहिए, रोमन लिपि का व्यवहार यहाँ हो ही नहीं सकता।
- महात्मा गाँधी।
अभिमान सौंदर्य का कटाक्ष है।
- अज्ञात।
कवि का हृदय कोमल होता है।
- गिरिजाकुमार घोष।
श्री रामायण और महाभारत भारत के ही नहीं वरन् पृथ्वी भर के जैसे अमूल्य महाकाव्य हैं।
- शैलजाकुमार घोष।
हिंदी किसी के मिटाने से मिट नहीं सकती।
- चंद्रबली पाण्डेय।
भाषा की उन्नति का पता मुद्रणालयों से भी लग सकता है।
- गंगाप्रसाद अग्निहोत्री।
पुस्तक की उपयोगिता को चिरस्थायी रखने के लिए उसे भावी संतानों के लिये पथप्रदर्शक बनाने के लिये यह आवश्यक है कि पुस्तक के असली लेखक का नाम उस पर रहे।
- सत्यदेव परिव्राजक।
खड़ी बोली का एक रूपांतर उर्दू है।
- बदरीनाथ भट्ट।
भारतवर्ष मनुष्य जाति का गुरु है।
- विनयकुमार सरकार।
हमारी भारत भारती की शैशवावस्था का रूप ब्राह्मी या देववाणी है, उसकी किशोरावस्था वैदिक भाषा और संस्कृति उसकी यौवनावस्था की संुदर मनोहर छटा है।
- बदरीनारायण चौधरी प्रेमधन।
हृतंत्री की तान पर नीरव गान गाने से न किसी के प्रति किसी की अनुकम्पा जगती है और न कोई किसी का उपकार करने पर ही उतारू होता है।
- रामचंद्र शुक्ल।
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
- भारतेंदू हरिश्चंद्र।
आर्यों की सबसे प्राचीन भाषा हिंदी ही है और इसमें तद्भव शब्द सभी भाषाओं से अधिक है।
- वीम्स साहब।
क्यों न वह फिर रास्ते पर ठीक चलने से डिगे , हैं बहुत से रोग जिसके एक ही दिल में लगे।
- हरिऔध।
जब तक साहित्य की उन्नति न होगी, तब तक संगीत की उन्नति नहीं हो सकती।
- विष्णु दिगंबर।
जो पढ़ा-लिखा नहीं है - जो शिक्षित नहीं है वह किसी भी काम को भली-भाँति नहीं कर सकता।
- गोपाललाल खत्री।
राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा है।
- महात्मा गाँधी।
जिस प्रकार बंगाल भाषा के द्वारा बंगाल में एकता का पौधा प्रफुल्लित हुआ है उसी प्रकार हिंदी भाषा के साधारण भाषा होने से समस्त भारतवासियों में एकता तरु की कलियाँ अवश्य ही खिलेंगी।
- शारदाचरण मित्र।
इतिहास स्वदेशाभिमान सिखाने का साधन है।
- महात्मा गांधी।
जो दिखा सके वही दर्शन शास्त्र है नहीं तो वह अंधशास्त्र है।
- डॉ. भगवानादास।
विदेशी लोगों का अनुकरण न किया जाय।
- भीमसेन शर्मा।
भारतवर्ष के लिये देवनागरी साधारण लिपि हो सकती है और हिंदी भाषा ही सर्वसाधारण की भाषा होने के उपयुक्त है।
- शारदाचरण मित्र।
अकबर का शांत राज्य हमारी भाषा का मानो स्वर्णमय युग था।
- छोटूलाल मिश्र।
नाटक का जितना ऊँचा दरजा है, उपन्यास उससे सूत भर भी नीचे नहीं है।
- गोपालदास गहमरी।
किसी भी बृहत् कोश में साहित्य की सब शाखाओं के शब्द होने चाहिए।
- महावीर प्रसाद द्विवेदी।
जो कुछ भी नजर आता है वह जमीन और आसमान की गोद में उतना सुंदर नहीं जितना नजर में है।
- निराला।
देव, जगदेव, देश जाति की सुखद प्यारी, जग में गुणगरी सुनागरी हमारी है।
- चकोर।
शिक्षा का मुख्य तात्पर्य मानसिक उन्नति है।
- पं. रामनारायण मिश्र।
भारत के एक सिरे से दूसरे सिरे तक हिंदी भाषा कुछ न कुछ सर्वत्र समझी जाती है।
- पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार।
जापानियों ने जिस ढंग से विदेशी भाषाएँ सीखकर अपनी मातृभाषा को उन्नति के शिखर पर पहुँचाया है उसी प्रकार हमें भी मातृभाषा का भक्त होना चाहिए।
- श्यामसुंदर दास।
विचारों का परिपक्व होना भी उसी समय संभव होता है, जब शिक्षा का माध्यम प्रकृतिसिद्ध मातृभाषा हो।
- पं. गिरधर शर्मा।
विज्ञान को विज्ञान तभी कह सकते हैं जब वह शरीर, मन और आत्मा की भूख मिटाने की पूरी ताकत रखता हो।
- महात्मा गांधी।
यह महात्मा गाँधी का प्रताप है, जिनकी मातृभाषा गुजराती है पर हिंदी को राष्ट्रभाषा जानकर जो उसे अपने प्रेम से सींच रहे हैं।
- लक्ष्मण नारायण गर्दे।
हिंदी भाषा के लिये मेरा प्रेम सब हिंदी प्रेमी जानते हैं।
- महात्मा गांधी।
सब विषयों के गुण-दोष सबकी दृष्टि में झटपट तो नहीं आ जाते।
- म. म. गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी।
किसी देश में ग्रंथ बनने तक वैदेशिक भाषा में शिक्षा नहीं होती थी। देश भाषाओं में शिक्षा होने के कारण स्वयं ग्रंथ बनते गए हैं।
- साहित्याचार्य रामावतार शर्मा।
जो भाषा सामयिक दूसरी भाषाओं से सहायता नहीं लेती वह बहुत काल तक जीवित नहीं रह सकती।
- पांडेय रामवतार शर्मा।
नागरीप्रचारिणी सभा के गुण भारी जिन तेरों देवनागरी प्रचार करिदीनो है।
- नाथूराम शंकर शर्मा।
जितना और जैसा ज्ञान विद्यार्थियों को उनकी जन्मभाषा में शिक्षा देने से अल्पकाल में हो सकता है; उतना और वैसा पराई भाषा में सुदीर्घ काल में भी होना संभव नहीं है।
- घनश्याम सिंह।
विदेशी भाषा में शिक्षा होने के कारण हमारी बुद्धि भी विदेशी हो गई है।
- माधवराव सप्रे।
मैं महाराष्ट्री हूँ, परंतु हिंदी के विषय में मुझे उतना ही अभिमान है जितना किसी हिंदी भाषी को हो सकता है।
- माधवराव सप्रे।
मनुष्य सदा अपनी मातृभाषा में ही विचार करता है। इसलिये अपनी भाषा सीखने में जो सुगमता होती है दूसरी भाषा में हमको वह सुगमता नहीं हो सकती।
- डॉ. मुकुन्दस्वरूप वर्मा।
हिंदी भाषा का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है।
- महात्मा गांधी।
राष्ट्रीयता का भाषा और साहित्य के साथ बहुत ही घनिष्ट और गहरा संबंध है।
- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद।
यदि हम अंग्रेजी दूसरी भाषा के समान पढ़ें तो हमारे ज्ञान की अधिक वृद्धि हो सकती है।
- जगन्नाथप्रसाद चतुर्वेदी।
स्वतंत्रता की कोख से ही आलोचना का जन्म है।
- मोहनलाल महतो वियोगी।
युग के साथ न चल सकने पर महात्माओं का महत्त्व भी म्लान हो उठता है।
- सु. च. धर।
हिंदी पर ना मारो ताना, सभा बतावे हिंदी माना।
- नूर मुहम्मद।
आप जिस तरह बोलते हैं, बातचीत करते हैं, उसी तरह लिखा भी कीजिए। भाषा बनावटी न होनी चाहिए।
- महावीर प्रसाद द्विवेदी।
हिंदी भाषा की उन्नति के बिना हमारी उन्नति असम्भव है।
- गिरधर शर्मा।
भाषा ही राष्ट्र का जीवन है।
- पुरुषोत्तमदास टंडन।
देह प्राण का ज्यों घनिष्ट संबंध अधिकतर। है तिससे भी अधिक देशभाषा का गुरुतर।
- माधव शुक्ल।
जब हम अपना जीवन जननी हिंदी, मातृभाषा हिंदी के लिये समर्पण कर दें तब हम हिंदी के प्रेमी कहे जा सकते हैं। - गोविन्ददास।
नागरी प्रचार देश उन्नति का द्वार है।
- गोपाललाल खत्री।
देश तथा जाति का उपकार उसके बालक तभी कर सकते हैं, जब उन्हें उनकी भाषा द्वारा शिक्षा मिली हो।
- पं. गिरधर शर्मा।
राष्ट्रभाषा की साधना कोरी भावुकता नहीं है।
- जगन्नाथप्रसाद मिश्र।
साहित्य को स्वैर संचा करने की इजाजत न किसी युग में रही होगी न वर्तमान युग में मिल सकती है।
- माखनलाल चतुर्वेदी।
अंग्रेजी सीखकर जिन्होंने विशिष्टता प्राप्त की है, सर्वसाधारण के साथ उनके मत का मेल नहीं होता। हमारे देश में सबसे बढ़कर जातिभेद वही है, श्रेणियों में परस्पर अस्पृश्यता इसी का नाम है।
- रवीन्द्रनाथ ठाकुर।
साहित्य की सेवा भगवान का कार्य है, आप काम में लग जाइए आपको भगवान की सहायता प्राप्त होगी और आपके मनोरथ परिपूर्ण होंगे।
- चंद्रशेखर मिश्र।
सब से जीवित रचना वह है जिसे पढ़ने से प्रतीत हो कि लेखक ने अंतर से सब कुछ फूल सा प्रस्फुटित किया है।
- शरच्चंद।
सिक्ख गुरुओं ने आपातकाल में हिंदी की रक्षा के लिये ही गुरुमुखी रची थी।
- संतराम शर्मा।
हिंदी जैसी सरल भाषा दूसरी नहीं है।
- मौलाना हसरत मोहानी।
ऐसे आदमी आज भी हमारे देश में मौजूद हैं जो समझते हैं कि शिक्षा को मातृभाषा के आसन पर बिठा देने से उसकी कीमत ही घट जायेगी।
- रवीन्द्रनाथ ठाकुर।
लोकोपकारी विषयों को आदर देने वाली नवीन प्रथा का स्थिर हो जाना ही एक बहुत बड़ा उत्साहप्रद कार्य है। - मिश्रबंधु।
हमारे साहित्य को कामधेनु बनाना है।
- चंद्रबली पांडेय।
भारत के विभिन्न प्रदेशों के बीच हिंदी प्रचार द्वारा एकता स्थापित करने वाले सच्चे भारत बंधु हैं।
- अरविंद।
हृदय की कोई भाषा नहीं है, हृदय-हृदय से बातचीत करता है।
- महात्मा गांधी।
मेरा आग्रहपूर्वक कथन है कि अपनी सारी मानसिक शक्ति हिन्दी के अध्ययन में लगावें।
- विनोबा भावे।
साहित्यिक इस बात को कभी न भूले कि एक ख्याल ही क्रिया का स्वामी है, उसे बढ़ाने, घटाने या ठुकरा देनेवाला।
- माखनलाल चतुर्वेदी।
एशिया के कितने ही राष्ट्र आज यूरोपीय राष्ट्रों के चंगुल से छूट गए हैं पर उनकी आर्थिक दासता आज भी टिकी हुई है।
- वी. सी. जोशी।
हिंदी द्वारा सारे भारत को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है।
- स्वामी दयानंद।
इस पथ का उद्देश्य नहीं है, श्रांत भवन में टिक रहना।
- जयशंकर प्रसाद।
विद्या अच्छे दिनों में आभूषण है, विपत्ति में सहायक और बुढ़ापे में संचित सामग्री है।
- अरस्तु।
अधिक अनुभव, अधिक विपत्ति सहना, और अधिक अध्ययन, ये ही विद्वता के तीन स्तंभ हैं।
- डिजरायली।
जैसे-जैसे हमारे देश में राष्ट्रीयता का भाव बढ़ता जायेगा वैसे ही वैसे हिंदी की राष्ट्रीय सत्ता भी बढ़ेगी।
- श्रीमती लोकसुन्दरी रामन् ।
शब्दे मारिया मर गया शब्दे छोड़ा राज। जे नर शब्द पिछानिया ताका सरिया काज।
- कबीर।
यदि स्वदेशाभिमान सीखना है तो मछली से जो स्वदेश (पानी) के लिये तड़प-तड़पकर जान दे देती है।
- सुभाषचन्द्र बसु।
प्रसिद्धि का भीतरी अर्थ यशविस्तार नहीं, विषय पर अच्छी सिद्धि पाना है।
- सूर्यकांत त्रिपाठी निराला।
सरस्वती से श्रेष्ठ कोई वैद्य नहीं और उसकी साधना से बढ़कर कोई दवा नहीं है।
- एक जपानी सूक्ति।
संस्कृत प्राकृत से संबंध विच्छेद कदापि श्रेयस्कर नहीं। - यशेदानंदन अखौरी।
राष्ट्रीय व्यवहार में हिंदी को काम में लाना देश की शीघ्र उन्नति के लिये आवश्यक है।
- महात्मा गांधी।
शिक्षा का प्रचार और विद्या की उन्नति इसलिये अपेक्षित है कि जिससे हमारे -स्वत्व का रक्षण हो।
- माधवराव सप्रे।
विधान भी स्याही का एक बिन्दु गिराकर भाग्यलिपि पर कालिमा चढ़ा देता है।
- जयशंकर प्रसाद।
जीवित भाषा बहती नदी है जिसकी धारा नित्य एक ही मार्ग से प्रवाहित नहीं होती।
- बाबूराव विष्णु पराड़कर।
वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।
- मैथिलीशरण गुप्त।
हिन्दी उन सभी गुणों से अलंकृत है जिनके बल पर वह विश्व की साहित्यिक भाषाओं की अगली श्रेणी में सभासीन हो सकती है।
- मैथिलीशरण गुप्त।
पराधीनता की विजय से स्वाधीनता की पराजय सहस्त्र गुना अच्छी है।
- अज्ञात।
कलाकार अपनी प्रवृत्तियों से भी विशाल हैं। उसकी भावराशि अथाह और अचिंत्य है।
- मैक्सिम गोर्की।
कला का सत्य जीवन की परिधि में सौन्दर्य के माध्यम द्वारा व्यक्त अखंड सत्य है।
- महादेवी वर्मा।
क्षण प्रति-क्षण जो नवीन दिखाई पड़े वही रमणीयता का उत्कृष्ट रूप है।
- माघ।
प्रसन्नता न हमारे अंदर है न बाहर वरन् वह हमारा ईश्वर के साथ ऐक्य है।
- पास्कल।
हिन्दी भाषा और साहित्य ने तो जन्म से ही अपने पैरों पर खड़ा होना सीखा है।
- धीरेन्द्र वर्मा।
साहित्यकार एक दीपक के समान है जो जलकर केवल दूसरों को ही प्रकाश देता है।
- अज्ञात।
बिना मातृभाषा की उन्नति के देश का गौरव कदापि वृद्धि को प्राप्त नहीं हो सकता।
- गोविन्द शास्त्री दुगवेकर।
विधाता कर्मानुसार संसार का निर्माण करता है किन्तु साहित्यकार इस प्रकार के बंधनों से ऊपर है।
- बागीश्वरजी।
श्रद्धा महत्व की आनंदपूर्ण स्वीकृति के साथ-साथ पूज्य बुद्धि का संचार है।
- रामचंद्र शुक्ल।
कविता सुखी और उत्तम मनुष्यों के उत्तम और सुखमय क्षणों का उद्गार है।
- शेली।
भय ही पराधीनता है, निर्भयता ही स्वराज्य है।
- प्रेमचंद।
वास्तविक महान् व्यक्ति तीन बातों द्वारा जाना जाता है-योजना में उदारता, उसे पूरी करने में मनुष्यता और सफलता में संयम।
- बिस्मार्क।
रमणीय अर्थ का प्रतिपादन करने वाले शब्द का नाम काव्य है।
- पंडितराज जगन्नाथ।
प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है।
- रामचंद्र शुक्ल।
अंग्रेजी को भारतीय भाषा बनाने का यह अभिप्राय है कि हम अपने भारतीय अस्तित्व को बिल्कुल मिटा दें।
- पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार।
अंग्रेजी का मुखापेक्षी रहना भारतीयों को किसी प्रकार से शोभा नहीं देता है।
- भास्कर गोविन्द धाणेकर।
यह हमारा दुर्भाग्य है कि हमारी शिक्षा विदेशी भाषा में होती है और मातृभाषा में नहीं होती।
- माधवराव सप्रे।
भाषा ही राष्ट्र का जीवन है।
- पुरुषोत्तमदास टंडन।
कविता मानवता की उच्चतम अनुभूति की अभिव्यक्ति है।
- हजारी प्रसाद द्विवेदी।
हिंदी स्वयं अपनी ताकत से बढ़ेगी।
- पं. नेहरू।
भाषा विचार की पोशाक है।
- डॉ. जोनसन।
हमारी देवनागरी इस देश की ही नहीं समस्त संसार की लिपियों में सबसे अधिक वैज्ञानिक है।
- सेठ गोविन्ददास।
अंग्रेजी के माया मोह से हमारा आत्मविश्वास ही नष्ट नहीं हुआ है, बल्कि हमारा राष्ट्रीय स्वाभिमान भी पददलित हुआ है।
- लक्ष्मीनारायण सिंह सुधांशु।
आइए हम आप एकमत हो कोई ऐसा उपाय करें जिससे राष्ट्रभाषा का प्रचार घर-घर हो जाये और राष्ट्र का कोई भी कोना अछूता न रहे।
- चन्द्रबली पांडेय।
जैसे जन्मभूमि जगदम्बा का स्वरूप है वैसे ही मातृभाषा भी जगदम्बा का स्वरूप है।
- गोविन्द शास्त्री दुगवेकर।
हिंदी और उर्दू की जड़ एक है, रूपरेखा एक है और दोनों को अगर हम चाहें तो एक बना सकते हैं।
- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद।
हिंदी आज साहित्य के विचार से रूढ़ियों से बहुत आगे है। विश्वसाहित्य में ही जानेवाली रचनाएँ उसमें हैं। - सूर्यकांत त्रिपाठी निराला।
भारत की रक्षा तभी हो सकती है जब इसके साहित्य, इसकी सभ्यता तथा इसके आदर्शों की रक्षा हो।
- पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार।
हिंदी संस्कृत की बेटियों में सबसे अच्छी और शिरोमणि है।
- ग्रियर्सन।
मैं नहीं समझता, सात समुन्दर पार की अंग्रेजी का इतना अधिकार यहाँ कैसे हो गया।
- महात्मा गांधी।
मेरे लिये हिन्दी का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है।
- राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन।
संस्कृत को छोड़कर आज भी किसी भी भारतीय भाषा का वाङ्मय विस्तार या मौलिकता में हिन्दी के आगे नहीं जाता।
- डॉ. सम्पूर्णानन्द।
उर्दू और हिंदी दोनों को मिला दो। अलग-अलग नाम नहीं होना चाहिए। - मौलाना मुहम्मद अली।
राष्ट्रभाषा के विषय में यह बात ध्यान में रखनी होगी कि यह राष्ट्र के सब प्रान्तों की समान और स्वाभाविक राष्ट्रभाषा है। - लक्ष्मण नारायण गर्दे।
प्रसन्नता न हमारे अंदर है न बाहर वरन् वह हमारा ईश्वर के साथ ऐक्य है।
- पास्कल।
विदेशी भाषा के शब्द, उसके भाव तथा दृष्टांत हमारे हृदय पर वह प्रभाव नहीं डाल सकते जो मातृभाषा के चिरपरिचित तथा हृदयग्राही वाक्य।
- मन्नन द्विवेदी।
जातीय भाव हमारी अपनी भाषा की ओर झुकता है।
- शारदाचरण मित्र।
हिंदी अपनी भूमि की अधिष्ठात्री है।
- राहुल सांकृत्यायन।
सारा शरीर अपना, रोम-रोम अपने, रंग और रक्त अपना, अंग प्रत्यंग अपने, किन्तु जुबान दूसरे की, यह कहाँ की सभ्यता और कहाँ की मनुष्यता है।
- रणवीर सिंह जी।
वाणी, सभ्यता और देश की रक्षा करना सच्चा यज्ञ है।
- ठाकुरदत्त शर्मा।
हिन्दी व्यापकता में अद्वितीय है।
- अम्बिका प्रसाद वाजपेयी।
हमारी राष्ट्रभाषा की पावन गंगा में देशी और विदेशी सभी प्रकार के शब्द मिलजुलकर एक हो जायेंगे।
- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद।
नागरी की वर्णमाला है विशुद्ध महान, सरल सुन्दर सीखने में सुगम अति सुखदान।
- मिश्रबंधु।
साहित्य ही हमारा जीवन है।
- डॉ. भगवानदास।
मनुष्य सदा अपनी भातृभाषा में ही विचार करता है।
- मुकुन्दस्वरूप वर्मा।
बिना भाषा की जाति नहीं शोभा पाती है। और देश की मार्यादा भी घट जाती है।
- माधव शुक्ल।
हिंदी और उर्दू एक ही भाषा के दो रूप हैं और दोनों रूपों में बहुत साहित्य है।
- अंबिका प्रसाद वाजपेयी।
हम हिन्दी वालों के हृदय में किसी सम्प्रदाय या किसी भाषा से रंचमात्र भी ईर्ष्या, द्वेष या घृणा नहीं है।
- शिवपूजन सहाय।
भारत के विभिन्न प्रदेशों के बीच हिन्दी प्रचार द्वारा एकता स्थापित करने वाले सच्चे भारत बंधु हैं।
- अरविंद।
राष्ट्रीय एकता के लिये हमें प्रांतीयता की भावना त्यागकर सभी प्रांतीय भाषाओं के लिए एक लिपि देवनागरी अपना लेनी चाहिये।
- शारदाचरण मित्र (जस्टिस)।
समूचे राष्ट्र को एकताबद्ध और दृढ़ करने के लिए हिन्द भाषी जाति की एकता आवश्यक है।
- रामविलास शर्मा।
हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनने के हेतु हुए अनुष्ठान को मैं संस्कृति का राजसूय यज्ञ समझता हूँ। - आचार्य क्षितिमोहन सेन।
हिन्दी का भविष्य उज्ज्वल है, इसमें कोई संदेह नहीं।
- अनंत गोपाल शेवड़े।
अरबी लिपि भारतीय लिपि होने योग्य नहीं।
- सैयदअली बिलग्रामी।
हिन्दी को ही राजभाषा का आसन देना चाहिए।
- शचींद्रनाथ बख्शी।
अंतरप्रांतीय व्यवहार में हमें हिन्दी का प्रयोग तुरंत शुरू कर देना चाहिए।
- र. रा. दिवाकर।
हिन्दी का शासकीय प्रशासकीय क्षेत्रों से प्रचार न किया गया तो भविष्य अंधकारमय हो सकता है। - विनयमोहन शर्मा।
अंग्रेजी इस देश के लिए अभिशाप है, यह हर साल हमारे सामने प्रकट होता है, फिर भी उसे हम पूतना न मानकर चामुण्डमर्दिनी दुर्गा मान रहे हैं।
- अवनींद्र कुमार विद्यालंकार।
हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने में प्रांतीय भाषाओं को हानि नहीं वरन् लाभ होगा।
- अनंतशयनम् आयंगार।
संस्कृत के अपरिमित कोश से हिन्दी शब्दों की सब कठिनाइयाँ सरलता से हल कर लेगी।
- राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन।
(अंग्रेजी ने) हमारी परम्पराएँ छिन्न-भिन्न करके, हमें जंगली बना देने का भरसक प्रयत्न किया।
- अमृतलाल नागर।
बाबा शेख फरीद
बाबा शेख फरीद का जन्म वर्ष 1173 में मुल्तान जिला के खोतवाल गांव में हुआ था। अनेक वर्षों तक हरियाणा के हांसी (हिसार) में रहकर वह खुदा की इबादत में लगे रहे। एक बार उन्होंने देखा कि नया-नया फकीर बना एक युवक किसी से भोजन नहीं मिलने पर गुस्से में गालियां दे रहा है। उस युवा फकीर को शांत करते हुए बाबा ने कहा, ‘खुदा के अलावा किसी से कुछ अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। जो दे, उसका भी भला और जो न दे, उसका भी भला-इस बात को मानकर चलना चाहिए। हृदय में ही खुदा का निवास है। दूसरे को गाली देकर क्या हम दोजख (नरक) में जाने का काम नहीं कर रहे?’ बाबा के शब्दों ने जादू का काम किया और वह युवक उनका शिष्य बन गया। बाबा ने हमेशा ऊंच-नीच की भावना का विरोध किया। उन्होंने लिखा, ‘अय फरीद, जब खालिफ खुलफ के भीतर मौजूद है और उसी में सब कुछ समाया है, तो किसको मंद और नीच समझा जाए।’ फरीद सूफी फकीर थे। उन्होंने फारसी में कविताओं की रचना की। उन्होंने लिखा, वार पराये वेसना साईं मुझे न देई। ईश्वर को छोड़कर किसी की आशा नहीं करनी चाहिए। एक शिष्य की जिज्ञासा का समाधान करते हुए उन्होंने कहा, ‘संतोष, नम्रता, सहनशीलता, ईमानदारी, त्याग और उदारता ऐसे गुण हैं, जो आदमी को खुदा के पास ले जाते हैं।’ जब एक युवक परिवार त्यागकर उनका शिष्य बनने पहुंचा, तो उन्होंने उससे कहा कि वृद्ध माता-पिता, पत्नी व बच्चों का दिल दुखाकर कोई जन्नत नहीं पा सकता। वह युवक वापस लौट गया।
अधर्म

अढाई सौ वर्ष पूर्व कुरुक्षेत्र में जन्में योगिराज वनखंडी महाराज परम विरक्त व सेवा भावी संत थे। उन्होंने दस वर्ष की आयु में ही उदासीन संप्रदाय के सिद्ध संत स्वामी मेलाराम जी से दीक्षा लेकर अपना समस्त जीवन धर्म व समाज सेवा के लिए समर्पित करने का संकल्प लिया था। एक बार पटियाला के राजा कर्मसिंह युवासंत वनखंडी को अपने राजमहल में ले गए। जब उन्होंने उनसे रात को महल में ही निवास करने का आग्रह किया, तो वनखंडी महाराज ने कहा, ‘साधु को किसी भी गृहस्थ के घर नहीं ठहरना चाहिए।’ राजा के हठ को देखकर वह रुक गए और आधी रात को चुपचाप महल से निकलकर वन में जा पहुंचे। संत वनखंडी एक बार तीर्थयात्रा करते हुए असम के कामाख्या देवी के मंदिर के दर्शनों के लिए पहुंचे। उन्हें पता चला कि कुछ अंधविश्वासी लोग देवी को प्रसन्न करने के नाम पर निरीह पशु-पक्षियों की बलि देते हैं। कभी-कभी कुछ दबंग व धनी लोग व्यक्तिगत हित साधने के लिए नरबलि जैसा पाप कर्म करने से भी बाज नहीं आते। वनखंडी महाराज ने निर्भीकतापूर्वक सभी के समक्ष कहा, ‘सभी प्राणीजन देवी मां की संतान हैं। मां करुणामयी होती है, वह किसी की बलि से खुश कैसे हो सकती है।’ उसी दिन से सभी ने संकल्प लिया कि नरबलि जैसा घोर पाप कर्म कभी नहीं होगा। वनखंडी जी सिंध-सक्खर पहुंचे। वहां उन्होंने सिंधु नदी के तट पर उदासीन संप्रदाय के साधुबेला तीर्थ की स्थापना की। यह तीर्थ उनकी कीर्ति का साकार स्मारक है।
लोभ
वनवास के दौरान यक्ष ने धर्मराज युधिष्ठिर से अनेक प्रश्न किए। उनसे एक प्रश्न किया गया कि किन-किन सद्गुणों के कारण मनुष्य क्या-क्या फल प्राप्त करता है और मानव का पतन किन-किन अवगुणों के कारण होता है? युधिष्ठिर ने बताया, ‘वेद का अभ्यास करने से मनुष्य श्रोत्रिय होता है, जबकि तपस्या से वह महत्ता प्राप्त करता है। जिसने मन पर नियंत्रण कर लिया, वह कभी दुखी नहीं होता। सद्पुरुषों की मित्रता स्थायी होती है। अहंकार का त्याग करने वाला सबका प्रिय होता है। जिसने क्रोध व लोभ को त्याग दिया, वह हमेशा सुखी रहता है। कामना को छोड़ने वाला और संतोष धारण करने वाला कभी आर्थिक दृष्टि से दरिद्र नहीं हो सकता।’ कुछ क्षण रुककर उन्होंने आगे कहा,
‘स्वधर्म पालन का नाम तप है। मन को वश में करना दम है। सबको सुखी देखने की इच्छा करुणा है। क्रोध मनुष्य का बैरी है और लोभ असीम व्याधि। जो जीव मात्र के हित की कामना करता है, वह साधु है। जो निर्दयी है, वह असाधु (दुर्जन) है। स्वधर्म में डटे रहना ही स्थिरता है। मन के मैल का त्याग करना ही सच्चा स्नान है।’ युधिष्ठिर ने यक्ष के असंख्य प्रश्नों का उत्तर देकर उसे संतुष्ट कर दिया। धर्मराज युधिष्ठिर स्वयं सभी सद्गुणों का पालन करते थे। ऐसे अनेक प्रसंग आए, जब वह धर्म के आदेशों पर अटल रहे। अनेक कठिनाइयां सहन करने के बाद भी उन्होंने धर्म का मार्ग नहीं छोड़ा।
‘स्वधर्म पालन का नाम तप है। मन को वश में करना दम है। सबको सुखी देखने की इच्छा करुणा है। क्रोध मनुष्य का बैरी है और लोभ असीम व्याधि। जो जीव मात्र के हित की कामना करता है, वह साधु है। जो निर्दयी है, वह असाधु (दुर्जन) है। स्वधर्म में डटे रहना ही स्थिरता है। मन के मैल का त्याग करना ही सच्चा स्नान है।’ युधिष्ठिर ने यक्ष के असंख्य प्रश्नों का उत्तर देकर उसे संतुष्ट कर दिया। धर्मराज युधिष्ठिर स्वयं सभी सद्गुणों का पालन करते थे। ऐसे अनेक प्रसंग आए, जब वह धर्म के आदेशों पर अटल रहे। अनेक कठिनाइयां सहन करने के बाद भी उन्होंने धर्म का मार्ग नहीं छोड़ा।
सहनशीलता
भगिनी निवेदिता धर्म, अध्यात्म तथा भारतीय संस्कृति से प्रभावित होकर अपना देश व परिवार छोड़कर भारत आईं। स्वामी विवेकानंद के प्रवचनों ने उन्हें इसके लिए प्रेरित किया था। एक दिन उन्होंने देखा कि स्वामी विवेकानंद किसी जिज्ञासु के प्रश्न का उत्तर देते हुए कह रहे थे कि बेसहारा अनाथ बच्चे साक्षात भगवान के समान हैं। दरिद्रनारायण की सेवा भगवान की सेवा है। भगिनी निवेदिता ने उसी समय संकल्प ले लिया कि वह बंगाल में अनाथ बालक-बालिकाओं के कल्याण के लिए एक आश्रम की स्थापना करेंगी। भगिनी निवेदिता कोलकाता के धनाढ्यों के पास पहुंचकर आश्रम के लिए दान मांगने लगीं। एक दिन वह किसी ऐसे सेठ के पास जा पहुंची,
जो अत्यंत कंजूस था। उसने विदेशी गोरी युवती को दान मांगते देखा, तो कहा, ‘मैंने मेहनत से एक-एक पैसा जोड़ा है। आश्रम-वाश्रम में दान क्यों दूं?’ फिर भी, निवेदिता बार-बार कुछ देने का आग्रह करती रहीं। बार-बार मांगने से सेठ आपा खो बैठा और उसने भगिनी निवेदिता को थप्पड़ जड़ दिया। थप्पड़ खाकर भी उस युवती ने धैर्य के साथ कहा, ‘आपने मुझे थप्पड़ दिया, इसे मैं स्वीकार करती हूं। अब अनाथ बच्चों के लिए भी तो कुछ दीजिए।’ सेठ भगिनी निवेदिता की सहनशीलता और समर्पण देख अपने कृत्य पर पछताने लगा। उसने आलमारी से रकम निकालकर उन्हें भेंट कर दी। साथ ही अपने व्यवहार के लिए उनसे क्षमा भी मांगी।
जो अत्यंत कंजूस था। उसने विदेशी गोरी युवती को दान मांगते देखा, तो कहा, ‘मैंने मेहनत से एक-एक पैसा जोड़ा है। आश्रम-वाश्रम में दान क्यों दूं?’ फिर भी, निवेदिता बार-बार कुछ देने का आग्रह करती रहीं। बार-बार मांगने से सेठ आपा खो बैठा और उसने भगिनी निवेदिता को थप्पड़ जड़ दिया। थप्पड़ खाकर भी उस युवती ने धैर्य के साथ कहा, ‘आपने मुझे थप्पड़ दिया, इसे मैं स्वीकार करती हूं। अब अनाथ बच्चों के लिए भी तो कुछ दीजिए।’ सेठ भगिनी निवेदिता की सहनशीलता और समर्पण देख अपने कृत्य पर पछताने लगा। उसने आलमारी से रकम निकालकर उन्हें भेंट कर दी। साथ ही अपने व्यवहार के लिए उनसे क्षमा भी मांगी।
सेवा-सफाई
महाराष्ट्र के प्रख्यात संत गाड़गे महाराज सेवा कार्य के लिए सदैव तत्पर रहा करते थे। अपने शिष्यों से वह अकसर कहा करते थे कि तीर्थयात्रा का असली पुण्य उन्हें लगता है, जो तीर्थस्थलों की गंदगी दूर करते हैं। तीर्थयात्रियों की सेवा करते हैं। गाड़गे महाराज किसी तीर्थस्थल में पहुंचते, तो वहां झाड़ू से स्वयं सफाई करने लगते। मंदिरों की सीढ़ियां साफ करने में उन्हें अत्यंत संतोष मिलता था। वर्ष 1907 की बात है। गाड़गे महाराज अमरावती के समीप ऋणमोचन तीर्थ में लगने वाले मेले में पहुंचे। उन्होंने नदी के किनारे पड़े पत्तलों व अन्य कूड़े को झाड़ू से हटाकर एक ओर कर दिया। नदी के किनारे एक स्थान पर एकत्रित गंदे जल को अपने साथियों के साथ उलीचकर बाहर निकाला और
जमीन खोदकर नदी की धारा वहां तक पहुंचाई। अचानक गाड़गे जी की मां भी स्नान के लिए वहां आ पहुंचीं। उन्होंने पुत्र को सफाई करते देखा, तो बोलीं, ‘यह काम तो सफाईकर्मी का होता है। तुम क्यों कर रहे हो?’ गाड़गे ने विनयपूर्वक कहा, ‘मां, श्रद्धालुओं की सेवा व पवित्र तीर्थ की सफाई भी भगवान की पूजा-उपासना ही है। मानव भगवान का ही तो रूप है।’ बेटे के श्रद्धा भरे वचन सुनकर मां गद्गद् हो उठी। गाड़गे महाराज ने गांव-गांव पहुंचकर लोगों को मांस-मदिरा का उपयोग न करने तथा सफाई रखने का संकल्प दिलाया।
जमीन खोदकर नदी की धारा वहां तक पहुंचाई। अचानक गाड़गे जी की मां भी स्नान के लिए वहां आ पहुंचीं। उन्होंने पुत्र को सफाई करते देखा, तो बोलीं, ‘यह काम तो सफाईकर्मी का होता है। तुम क्यों कर रहे हो?’ गाड़गे ने विनयपूर्वक कहा, ‘मां, श्रद्धालुओं की सेवा व पवित्र तीर्थ की सफाई भी भगवान की पूजा-उपासना ही है। मानव भगवान का ही तो रूप है।’ बेटे के श्रद्धा भरे वचन सुनकर मां गद्गद् हो उठी। गाड़गे महाराज ने गांव-गांव पहुंचकर लोगों को मांस-मदिरा का उपयोग न करने तथा सफाई रखने का संकल्प दिलाया।
परख
आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती वर्ष 1872 में धर्म प्रचार के लिए कोलकाता पहुंचे। प्रसिद्ध समाजसेवी व विद्वान केशवचंद्र सेन वहां ब्रह्म समाज के प्रचार-प्रसार में जुटे थे। उन्होंने स्वामी जी की ख्याति सुन रखी थी। स्वामी जी भी केशवचंद्र सेन के विचारों से सुपरिचित थे। एक दिन अचानक श्री सेन स्वामी जी से मिलने जा पहुंचे। बिना परिचय दिए ही उन्होंने वार्ता शुरू कर दी। कुछ देर बाद उन्होंने स्वामी जी से पूछा, ‘कोलकाता आने के बाद क्या केशवचंद्र सेन से मिले।’ स्वामी जी उनकी बातचीत से समझ गए थे कि वही केशवचंद्र हैं। वह बोले, ‘आज ही अभी-अभी मिला हूं। मेरे सामने बैठे हैं वह।’ केशवचंद्र सेन ने पूछा, ‘आपने कैसे पहचान लिया?’ स्वामी जी ने जवाब दिया, ‘विचार व्यक्त करते समय ही मैं समझ गया कि आप कौन हैं।’ केशवचंद्र सेन ने जिज्ञासा व्यक्त की, ‘वेद को आप ईश्वरीय ज्ञान कैसे मानते हैं?’ स्वामी जी ने कहा, ‘असली ज्ञान तार्किक होता है। वेदों में कोई चमत्कारिक घटना नहीं है। वे मानव मात्र के कल्याण का साधन बताते हैं। इसलिए वेद ज्ञान सर्वश्रेष्ठ हैं।’ केशवचंद्र उनके ज्ञान से प्रभावित होकर बोले, ‘यदि आप अंगरेजी जानते, तो मैं आपको अपने साथ धर्म-प्रचार के लिए इंग्लैंड ले जाता।’ स्वामी जी ने कहा, ‘यदि आप अंगरेजी के साथ-साथ संस्कृत जानते, तो आप यहां के लोगों को अपनी बात अच्छे ढंग से समझा सकते थे।’ यह सुनकर सेन मुस्करा उठे। धार्मिक विषयों में मतभेद के बावजूद समाज सुधार के क्षेत्र में दोनों का सहयोग बना रहा।
वरदान
राज्यवर्द्धन परम धर्मात्मा तथा प्रजाहितैषी राजा थे। एक दिन रानी मानिनी उनके सिर में तेल लगा रही थीं कि अचानक उन्हें कुछ सफेद बाल दिखे। रानी चिंतित हो उठीं। राजा को जब पत्नी की चिंता का कारण पता चला, तो वह बोले, ‘जन्म लेने के बाद सभी जवान होते हैं और उन्हें बूढ़ा भी होना पड़ता है। इसलिए चिंता कैसी?’ फिर एक दिन राजा ने घोषणा की, ‘हमने पूर्ण धर्मानुसार जीवन बिताया है। प्रजा की सेवा में कोई कसर नहीं रखी। अब बुढ़ापे ने अपनी झलक दिखाकर हमें वन में जाकर साधना करने की प्रेरणा दी है।’ राजा प्रजा में बहुत लोकप्रिय थे। उनका यह निर्णय सुनकर सभी चिंतित हो उठे। सबने राजा से वन न जाने का आग्रह किया, पर वह तैयार नहीं हुए। तब गंधर्व सुदाम ने सुझाव दिया कि भगवान भास्कर को प्रसन्न किया जाए। वह राजा को सैकड़ों वर्षों तक स्वस्थ बने रहने का वरदान दे सकते हैं। राज्य के अनेक लोगों ने कामरूप पर्वत पर जाकर तप शुरू कर दिया। घोर तप के बाद भगवान भास्कर ने दर्शन दिए और सभी से वर मांगने को कहा। प्रजाजनों ने कहा, ‘हमारे राजा को एक हजार वर्ष तक रोग न हो और बुढ़ापा उनसे दूर रहे।’ भगवान भास्कर ने तथास्तु कह दिया। राज्यवर्द्धन को जब यह बताया गया, तो वह बोले, ‘तब तक तो रानी समेत कोई प्रियजन जीवित नहीं रहेगा। भला मैं अकेला जीवित रहकर क्या करूंगा?’ भगवान भास्कर राजा की इस भावना से बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने राजा के बंधु-बांधवों तथा प्रजा को भी दीर्घायु होने का वरदान दिया।
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