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Saturday, June 26, 2010

अधर्म

महर्षि व्यास के पुत्र शुकदेव ने किसी विद्वान से ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त की। पिता ने उन्हें राजा जनक के पास भेज दिया। शुकदेव जी महाराज जनक के राजमहल पहुंचे। उन्हें लगा कि प्रचुर ऐश्वर्य से घिरे जनक क्या उपदेश देंगे? वह निराश होकर लौटने ही वाले थे कि जनक जी ने उन्हें बुलवाया और कहा, ‘धर्मचर्चा  सत्संग भवन में करेंगे।सत्संग भवन पहुंचकर उन्होंने शुकदेव से आत्मा-परमात्मा संबंधी बातचीत शुरू कर दी। अचानक कुछ राज कर्मचारी हांफते हुए वहां पहुंचे और सूचना दी कि महल के एक कक्ष में आग लग गई है। राजा जनक ने शांत भाव से उत्तर दिया, ‘मैं इस समय मुनि के साथ ईश्वर संबंधी चिंतन में लीन हूं। आग से बचाव का प्रयास करो। सांसारिक संपत्ति नष्ट होती हो, तो हो जाने दो।देखते-देखते आग सत्संग भवन तक पहुंच गई। राजा जनक पास आती आग देखकर भी बेचैन नहीं हुए, किंतु शुकदेव अपनी पुस्तकें उठाकर उस कक्ष से बाहर निकल आए। उन्होंने देखा कि राजा जनक को न तो अपनी संपत्ति नष्ट होने की चिंता थी और न ही किसी के जलकर मरने की। वह निश्चिंत होकर ईश्वर चिंतन में लगे रहे। कुछ देर बाद महाराज जनक ने शुकदेव जी से कहा, ‘दुख का मूल संपत्ति नहीं, संपत्ति से आसक्ति है। संसार में हमें केवल वस्तुओं के उपयोग का अधिकार दिया गया है। अक्षय संपत्ति के स्वामी और निर्धन, दोनों को मृत्यु के समय सब कुछ यहीं छोड़कर जाना होता है। इसलिए नाशवान धन-संपत्ति के प्रति अधिक आसक्ति अधर्म है।’ 

Friday, June 25, 2010

हस्त दर्शन

एक ऋषि अपने छात्रों को वेदों का  अध्ययन करा रहे थे। उन्होंने ऋग्वेद के  एक मंत्र  अयं मे हस्तो भगवानयं में भगवत्तरः, अयं मे विश्वभेषजोडयं शिवाभिमर्शनः का अर्थ समझाया  जिसका अर्थ था  यह मेरा हाथ भगवान अर्थात ऐश्वर्यशाली है। यह अत्यंत भाग्यशाली है। यह दुनिया के सभी रोगों का चिकित्सक है। यह  कल्याणकारी स्पर्शवाला है। ऋषि ने कहा इस संदेश का अर्थ यही है कि हाथों से श्रम या पुरुषार्थ करने वाला सदैव सुखी, प्रसन्न तथा स्वस्थ रहता है। वैसे तो मानव शरीर का प्रत्येक अंग महत्वपूर्ण है, किंतु कर्म और पुरुषार्थ में हाथों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। हाथों से निरंतर काम  करते रहकर वैभवशाली  बना जा सकता है। जबकि हाथों पर हाथ धरे बैठा व्यक्ति निठल्ला कहलाता है। जब हम अपने हाथों से श्रम करते हैं, तब रोग स्वतः दूर रहने को मजबूर हो जाते हैं।’ स्वामी  के पास एक व्यक्ति पहुंचा। उसके चेहरे पर निराशा देखकर स्वामी जी ने इसका कारन पूछा ? उसने कहा, ‘धन की कमी  के कारण परेशान हूं। मैं अपने को सबसे बड़ा अभागा मानने लगा हूं।’ स्वामी जी ने उसका हाथ अपने हाथ में लिया और बोले, ‘अरे मूर्ख, इन दो हाथों के होते हुए भी अभागे कैसे हो? इनकी मुट्ठियों में तो तुम्हारा भाग्य है। निराशा त्यागो और इन हाथों से श्रम करो, ऐश्वर्य स्वयं तुम्हारे पास दौड़ा आएगा।’ यदि कोई महिला स्वादिष्ट भोजन बनाती है, तो कहा जाता है कि उसके हाथों में जादू है। कोई चिकित्सक रोगियों को स्वस्थ कर देता है, तो कहा ही जाता है कि उस डॉक्टर के हाथ की शफा है। अगर कोई सच्चा संत सिर पर हाथ रख दे, तो कहा जाता है कि हाथ के स्पर्श से अपूर्व शांति मिली है। भारतीय परंपरा में इसलिए तो सवेरे शैया से उठकर सर्वप्रथम हस्त दर्शन करने को शुभ माना गया है। 

Wednesday, June 23, 2010

ईश्वर की कृपा

सेठ जमनालाल बजाज ने  आजीवन स्वदेशी वस्तुओं के  उपयोग संकल्प लिया था ! एक   प्रतिज्ञा यह भी थी कि वह प्रतिदिन किसी-न-किसी संत-महात्मा या विद्वान का सत्संग करेंगे।  वह एक दिन संत का सत्संग करने पहुंचे। इस  दौरान उन्होंने कहा, ‘महाराज, आप जैसे संतों के आशीर्वाद से मैंने अपने जीवन में आय के इतने साधन अर्जित कर लिए हैं कि मेरी सात पीढ़ियों को कमाने की चिंता नहीं करनी पड़ेगी।  कभी-कभी मुझे आठवीं पीढ़ी की चिंता होती है कि उसके भाग्य में पता नहीं, क्या होगा?’ संत जी ने कहा, ‘सेठ जी,  आप चिंता  न करें। कल  आप यहां आ जाएं।  सभी चिंताओं का समाधान हो जाएगा।’ सेठ जमनालाल बजाज अगली सुबह-सुबह उनकी कुटिया पर जा पहुंचे। संत ने कहा गांव के मंदिर के पास झाड़ू बनाने वाला एक गरीब परिवार झोपड़पट्टी में रहता है।  उसे एक दिन के भोजन के लिए दाल-आटा दे आओ। सेठ आटा-दाल लेकर उस झोंपड़ी पर पहुंचे। दरवाजे पर आवाज देते ही एक वृद्धा निकलकर बाहर आई। सेठ जी ने उसे लाया हुआ सामान  थमाया, तो वह बोली, ‘बेटा, इसे वापस लेकर जा। आज का दाना-पानी तो आ गया है।’ जमनालाल जी ने कहा, ‘तो कल के लिए इसे रख लो।’ वृद्धा बोली, ‘जब ईश्वर ने आज का इंतजाम कर दिया है, तो कल का भी वह अवश्य करेगा। आप इसे किसी जरूरतमंद को दे देना।’ वृद्धा के शब्द सुनकर सेठ जमनालाल बजाज पानी-पानी हो गए। उन्होंने विरक्ति और त्याग की मूर्ति उस वृद्धा के चरण छूकर आशीर्वाद मांगा और वापस हो गए। इस घटना के बाद वह स्वयं कहा करते थे ‘कर्म करते रहो ईश्वर की कृपा से आवश्यकताओं की पूर्ति अपने आप  होती रहेगी।

Tuesday, June 22, 2010

विनम्रता और दया

 सत्संग के लिए आने वालों से संत कबीर अकसर कहा करते थे कि अपने काम को पूरी लगन से करते हुए भगवान का चिंतन करते रहना चाहिए। एक दिन एक श्रद्धालु कबीर के दर्शन के लिए आया। उसने उनसे कहा, ‘बाबा आप तो दिन भर बैठे करघे पर कपड़ा बुनते रहते हैं। फिर भला भगवान का ध्यान-स्मरण कब कर लेते हैं?’ कबीर उसे अपने साथ लेकर गंगा तट पर पहुंचे। एक महिला गंगाजल से भरा गागर अपने सिर पर रखे लौट रही थी। गागर को उसने पूरी तरह छोड़ रखा था और मुंह से गंगा की महिमा के गीत गुनगुना रही थी। लेकिन गागर से एक बूंद भी गंगाजल नहीं छलक रहा था। कबीर उसकी तरफ इशारा करते हुए बोले, इस महिला को ध्यान से देखो। यह मुंह से गंगा का- भगवान का स्मरण कर रही है और इसे यह भी पूरा ध्यान है कि गागर गिर न पाए। दोनों काम एक साथ साधना इस महिला से सीखो। मैं भी हाथों से करघा चलाता हूं, और ऐसा करते हुए मुख से राम नाम जपता रहता हूं। परमात्मा का नाम तो हर क्षण भक्त के हृदय व मन में रमते रहना चाहिए।’ कबीर के इस उपदेश से जिज्ञासु की समस्या का समाधान हो गया। संत कबीर धर्म के नाम पर पनपने वाले आडंबर के घनघोर विरोधी थे। उन्होंने अपनी साखियों में अभिमान में अंधे, ढोंगी-नशेड़ी साधुओं पर काफी कठोर लहजे में प्रहार किए थे। अपने को चमत्कारी साधु या गुरु बताने वाले अहंकारी साधुओं पर उन्होंने लिखा, घर-घर मंतर देत फिरत हैं, महिमा के अभिमाना/ गुरु सहित शिष्य सब बूड़ें, अंत काल पछताना। कबीरदास का मत था कि वही साधु-महात्मा सच्चा गुरु कहलाने का अधिकारी है, जो स्वयं सदाचारी, संयमी और ज्ञानी है। जिसके मन में विनम्रता और दया का वास नहीं है, वह आखिर गुरु कैसे हो सकता है।

Monday, June 21, 2010

परम संतोष

धृतराष्ट्र समय-समय पर महात्मा विदुर के सत्संग के लिए लालायित रहा करते थे। वह जानते थे कि विदुर जो सलाह देते हैं, वह पूर्णतया धर्मसम्मत होती है। वह उनके कटु लगने वाले वचनों को भी कल्याणकारक मानते थे। एक दिन विदुर जी ने धृतराष्ट्र को उपदेश देते हुए कहा, ‘राजन, केवल धर्म ही कल्याणकारक है। एकमात्र क्षमा ही शांति का सर्वश्रेष्ठ उपाय है। विद्या ही परम संतोष देने वाली है। काम, क्रोध और लोभ, मनुष्य के पुण्य का नाश करने वाले नरक के तीन दरवाजे हैं। अतः हर हाल में इनका त्याग करना चाहिए।’ जब उन्होंने देखा कि धृतराष्ट्र पुत्रमोह में सत्य की अवहेलना कर रहे हैं, तो विदुर जी ने कहा, ‘जैसे नदी के पार जाने के लिए नाव ही एकमात्र साधन है, उसी प्रकार स्वर्ग के लिए सत्य ही एकमात्र सोपान है।’ विदुर जी जानते थे कि मोह के कारण ही धृतराष्ट्र पतन को प्राप्त होंगे। इसलिए वह उनसे अकसर कहते, ‘जैसे सूखी लकड़ी में मिल जाने से गीली लकड़ी भी जल जाती है, ठीक उसी तरह दुष्टों का त्याग न करने और उनके साथ मिले रहने से निरपराध सज्जनों को भी दंड भोगना पड़ता है, इसलिए दुर्व्यसनी एवं अहंकारी का साथ तुरंत त्याग देना चाहिए। किसी के मोह में पड़कर दूसरे के साथ अन्याय घोर अधर्म है। आप कौरवों और पांडवों के साथ समान रूप से कोमलता का व्यवहार कीजिए। ऐसा करने से आपको इस लोक में सुयश तो प्राप्त होगा ही, मृत्यु के बाद स्वर्गलोक की प्राप्ति होगी।’ विदुर को श्रीकृष्ण का पूर्ण आशीर्वाद प्राप्त था। भगवान श्रीकृष्ण भी उनकी धर्मपरायणता तथा भक्ति भावना के कायल थे।

Sunday, June 20, 2010

विनम्रता

शिक्षाविद और राजनेता डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी 1952 में भगवान बुद्ध के दो प्रधान शिष्यों सारिपुत्त और महमोग्गलामने के पवित्र भस्मावशेष लेकर म्यांमार गए थे। उसके बाद कंबोडिया के बौद्ध धर्मावलंबियों ने उन्हें अपने देश में आमंत्रित किया। कंबोडिया की राजधानी नॉमपेन्ह में आयोजित बौद्ध महासम्मेलन में उन्होंने कहा, ‘भगवान बुद्ध सनातन धर्मियों द्वारा दशावतार के रूप में पूजे जाते हैं। धर्म के नाम पर प्रचलित ऊंच-नीच की कुप्रवृत्ति के उन्मूलन में उनका योगदान सराहनीय है। उनके इस ऋण से हम कभी उऋण नहीं हो सकते।’ बौद्ध धर्म व दर्शन पर उनका भाषण सुनकर सभी प्रभावित हुए। सम्मेलन में उपस्थित कंबोडिया के एक बौद्ध लामा डॉ. मुखर्जी की श्रद्धा-भावना देखकर भाव-विह्वल हो उठे। वह मुखर्जी के पास पहुंचे और यह कहकर उनके पैरों की ओर झुके कि आप हमारे भगवान बुद्ध की पावन जन्मभूमि में जन्मे हैं, इसलिए हमारे लिए श्रद्धा भाजन हैं। इस पर मुखर्जी ने उन्हें रोकते हुए कहा, ‘आप भिक्षु हैं और हमारी संस्कृति में साधु-संतों के चरण स्पर्श करने की परंपरा है।’ यह कहते-कहते वह तुरंत उनके चरणों में झुक गए। डॉ. मुखर्जी जैसे अग्रणी नेता की इस विनम्रता को देखकर सभी हतप्रभ रह गए। डॉ. मुखर्जी परम धार्मिक व्यक्ति और विनम्रता की मूर्ति थे। 23 जून, 1953 को श्रीनगर में नजरबंदी के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। नजरबंदी काल में भी प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती का पाठ करने के बाद ही वह अन्न-जल ग्रहण करते थे

Tuesday, June 15, 2010

अहंकार पतन का कारण

राजा भुवनेश्वर ने अनेक अश्वमेध और वाजपेय यज्ञ कराए थे। उन्हें अहंकार हो गया कि पृथ्वी पर उनसे बड़ा धर्मात्मा और कोई नहीं है। उन्होंने राज्य में घोषणा करा दी कि यज्ञ होम करके ही पूजा-उपासना की जा सकती है। जो इस आज्ञा का पालन नहीं करेगा, उसे दंड दिया जाएगा। राज्य में हरिमित्र नामक एक पहुंचे हुए भक्त रहते थे। एक दिन नदी के तट पर जब वह वीणा पर संकीर्तन कर रहे थे, तो राजा के दूत ने उन्हें देख लिया। उसने राजा से शिकायत कर दी कि एक ब्राह्मण यज्ञ होम करने की जगह मूर्ति के सामने नाच-गाकर भगवान को रिझाने का प्रयास कर रहा है। अहंकार में डूबे राजा ने हरिमित्र को पकड़कर दरबार में बुलवाया और पूछा, ‘तुम वेदों के अनुसार यज्ञ-हवन न करके मनमानि ढंग से कीर्तन द्वारा पूजा क्यों कर रहे हो?’ हरिमित्र का उत्तर था, ‘राजन, मैं वेदशास्त्रों के गूढ़ रहस्यों को नहीं समझ सकता। भगवान की मूर्ति के सामने नाच-गाकर उनके नाम का उच्चारण करने से मुझे परम शांति मिलती है।’ राजा संतुष्ट नहीं हुआ और उसने उन्हें राज्य से निकल जाने का आदेश दिया। कुछ दिनों बाद राजा भुवनेश्वर की मृत्यु हो गई। यमराज ने उनके कर्मों का खाता देखकर उन्हें उल्लू की योनि में भेजने का आदेश दिया। राजा ने सकपकाकर धर्मराज से पूछा, ‘मैंने जीवन में असंख्य अश्वमेध यज्ञ किए हैं। प्रजा को धर्मशास्त्रों के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। ऐसा फिर भला कौन सा पाप है, जो मुझे उल्लू योनि में भेजा जा रहा है?’ धर्मराज ने राजा को हरिमित्र वाली घटना की याद दिलाते हुए बताया, ‘अहंकार और मनमाने व्यवहार के कारण ही तुम्हारे तमाम पुण्य क्षीण हो गए हैं। इसलिए तुम्हें उल्लू योनि में भेजा जा रहा है।’ राजा समझ गया कि अहंकार पतन का कारण अवश्य बनता है

Monday, June 14, 2010

प्रजा कल्याण


सुरथ मनु धर्मात्मा राजा थे। प्रजा को किसी प्रकार का कष्ट हो, इसका वह विशेष ध्यान रखते थे। मेधा ऋषि से उन्होंने दीक्षा ली थी। गुरु ने उन्हें अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखने का उपदेश दिया। एक दिन किसी सलाहकार ने उनसे कहा, ‘राजा को प्रतिवर्ष अपने राज्य का विस्तार करते रहना चाहिए।सलाहकार की बातों ने राजा सुरथ के मन में राज्य विस्तार की आकांक्षा जगा दी। उन्होंने आसपास के अनेक राज्यों को अपने राज्य में मिला लिया। इस सफलता ने उनमें चक्रवर्ती सम्राट बनने की लालसा पैदा कर दी। एक बार उन्होंने सेना में वृद्धि कर कोवा विधवंशी नामक राजा पर आक्रमण कर दिया। पर उस राज्य के सैनिकों ने सुरथ की विशाल सेना का संहार कर दिया। सुरथ मनु इस हार से अत्यंत निराश हो गए। एक दिन वह मेधा ऋषि के आश्रम में पहुंचे और उनके चरणों में गिरकर बोले, ‘गुरुदेव, असीमित इच्छाओं के कारण मैं कहीं का रहा। मैं साधु बनकर आपके चरणों में जीवन बिताना चाहता हूं।गुरु ने कहा, ‘मैंने कहा था कि आकांक्षाएं सीमित रखनी चाहिए। राज-मद को पास नहीं फटकने देना चाहिए। तुमने मेरे वचनों का पालन नहीं किया। इसी से तुम्हारी यह दशा हुई है। अब धैर्य रखो।गुरु के शब्दों से उनकी निराशा दूर हुई। कुछ समय बाद उन्होंने अपना राज्य फिर से वापस पा लिया। उसके बाद तो सुरथ किसी भी प्रकार की आकांक्षा और मद से दूर रहकर प्रजा कल्याण में लगे रहे।


Saturday, May 22, 2010

साधु के लक्षण

संत कबीरदास धर्म के नाम पर पाखंड करने वालों से बचकर रहने की प्रेरणा दिया करते थे। काशी के गंगातट पर वह किसी साधुवेशधारी को नशा करते या अमर्यादित आचरण करते देखते, तो उसे इन पाप कर्मों से बचने का सुझाव देते। एक बार किसी श्रद्धालु ने कबीर से पूछा, ‘साधु के लक्षण क्या होते हैं?’ उन्होंने तपाक से कहा, साधु सोई जानिए, चले साधु की चाल। परमारथ राता रहै, बोलै वचन रसाल। यानी संत उसी को जानो, जिसके आचरण संत की तरह शुद्ध हैं। जो परोपकार-परमार्थ में लगा हो और सबसे मीठे वचन बोलता हो। कबीरदास ने अपनी साखी में लिखा, ‘संत उन्हीं को जानो, जिन्होंने आशा, मोह, माया, मान, हर्ष, शोक और परनिंदा का त्याग कर दिया हो। सच्चे संतजन अपने मान-अपमान पर ध्यान नहीं देते। दूसरे से प्रेम करते हैं और उसका आदर भी करते हैं।’ उनका मानना था कि यदि साधु एक जगह ही रहने लगेगा,
तो वह मोह-माया से नहीं बच सकता। इसलिए उन्होंने लिखा, बहता पानी निरमला- बंदा गंदा होय। साधुजन रमता भला- दाग न लागै कोय। संत कबीरदास जानते थे कि ऐसा समय आएगा, जब सच्चे संतों की बात न मानकर लोग दुर्व्यसनियों की पूजा करेंगे। इसलिए उन्होंने लिखा था, यह कलियुग आयो अबै, साधु न मानै कोय। कामी, क्रोधी, मसखरा, तिनकी पूजा होय। आज कबीर की वाणी सच्ची साबित हो रही है तथा संत वेशधारी अनेक बाबा घृणित आरोपों में घिरे हैं।

Saturday, May 15, 2010

बाबा शेख फरीद

बाबा शेख फरीद का जन्म वर्ष 1173 में मुल्तान जिला के खोतवाल गांव में हुआ था। अनेक वर्षों तक हरियाणा के हांसी (हिसार) में रहकर वह खुदा की इबादत में लगे रहे। एक बार उन्होंने देखा कि नया-नया फकीर बना एक युवक किसी से भोजन नहीं मिलने पर गुस्से में गालियां दे रहा है। उस युवा फकीर को शांत करते हुए बाबा ने कहा, ‘खुदा के अलावा किसी से कुछ अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। जो दे, उसका भी भला और जो न दे, उसका भी भला-इस बात को मानकर चलना चाहिए। हृदय में ही खुदा का निवास है। दूसरे को गाली देकर क्या हम दोजख (नरक) में जाने का काम नहीं कर रहे?’ बाबा के शब्दों ने जादू का काम किया और वह युवक उनका शिष्य बन गया। बाबा ने हमेशा ऊंच-नीच की भावना का विरोध किया। उन्होंने लिखा, ‘अय फरीद, जब खालिफ खुलफ के भीतर मौजूद है और उसी में सब कुछ समाया है, तो किसको मंद और नीच समझा जाए।’ फरीद सूफी फकीर थे। उन्होंने फारसी में कविताओं की रचना की। उन्होंने लिखा, वार पराये वेसना साईं मुझे न देई। ईश्वर को छोड़कर किसी की आशा नहीं करनी चाहिए। एक शिष्य की जिज्ञासा का समाधान करते हुए उन्होंने कहा, ‘संतोष, नम्रता, सहनशीलता, ईमानदारी, त्याग और उदारता ऐसे गुण हैं, जो आदमी को खुदा के पास ले जाते हैं।’ जब एक युवक परिवार त्यागकर उनका शिष्य बनने पहुंचा, तो उन्होंने उससे कहा कि वृद्ध माता-पिता, पत्नी व बच्चों का दिल दुखाकर कोई जन्नत नहीं पा सकता। वह युवक वापस लौट गया। 

अधर्म


अढाई सौ वर्ष पूर्व कुरुक्षेत्र में जन्में योगिराज वनखंडी महाराज परम विरक्त व सेवा भावी संत थे। उन्होंने दस वर्ष की आयु में ही उदासीन संप्रदाय के सिद्ध संत स्वामी मेलाराम जी से दीक्षा लेकर अपना समस्त जीवन धर्म व समाज सेवा के लिए समर्पित करने का संकल्प लिया था। एक बार पटियाला के राजा कर्मसिंह युवासंत वनखंडी को अपने राजमहल में ले गए। जब उन्होंने उनसे रात को महल में ही निवास करने का आग्रह किया, तो वनखंडी महाराज ने कहा, ‘साधु को किसी भी गृहस्थ के घर नहीं ठहरना चाहिए।’ राजा के हठ को देखकर वह रुक गए और आधी रात को चुपचाप महल से निकलकर वन में जा पहुंचे। संत वनखंडी एक बार तीर्थयात्रा करते हुए असम के कामाख्या देवी के मंदिर के दर्शनों के लिए पहुंचे। उन्हें पता चला कि कुछ अंधविश्वासी लोग देवी को प्रसन्न करने के नाम पर निरीह पशु-पक्षियों की बलि देते हैं। कभी-कभी कुछ दबंग व धनी लोग व्यक्तिगत हित साधने के लिए नरबलि जैसा पाप कर्म करने से भी बाज नहीं आते। वनखंडी महाराज ने निर्भीकतापूर्वक सभी के समक्ष कहा, ‘सभी प्राणीजन देवी मां की संतान हैं। मां करुणामयी होती है, वह किसी की बलि से खुश कैसे हो सकती है।’ उसी दिन से सभी ने संकल्प लिया कि नरबलि जैसा घोर पाप कर्म कभी नहीं होगा। वनखंडी जी सिंध-सक्खर पहुंचे। वहां उन्होंने सिंधु नदी के तट पर उदासीन संप्रदाय के साधुबेला तीर्थ की स्थापना की। यह तीर्थ उनकी कीर्ति का साकार स्मारक है।

लोभ

 वनवास के दौरान यक्ष ने धर्मराज युधिष्ठिर से अनेक प्रश्न किए। उनसे एक प्रश्न किया गया कि किन-किन सद्गुणों के कारण मनुष्य क्या-क्या फल प्राप्त करता है और मानव का पतन किन-किन अवगुणों के कारण होता है? युधिष्ठिर ने बताया, ‘वेद का अभ्यास करने से मनुष्य श्रोत्रिय होता है, जबकि तपस्या से वह महत्ता प्राप्त करता है। जिसने मन पर नियंत्रण कर लिया, वह कभी दुखी नहीं होता। सद्पुरुषों की मित्रता स्थायी होती है। अहंकार का त्याग करने वाला सबका प्रिय होता है। जिसने क्रोध व लोभ को त्याग दिया, वह हमेशा सुखी रहता है। कामना को छोड़ने वाला और संतोष धारण करने वाला कभी आर्थिक दृष्टि से दरिद्र नहीं हो सकता।’ कुछ क्षण रुककर उन्होंने आगे कहा,
‘स्वधर्म पालन का नाम तप है। मन को वश में करना दम है। सबको सुखी देखने की इच्छा करुणा है। क्रोध मनुष्य का बैरी है और लोभ असीम व्याधि। जो जीव मात्र के हित की कामना करता है, वह साधु है। जो निर्दयी है, वह असाधु (दुर्जन) है। स्वधर्म में डटे रहना ही स्थिरता है। मन के मैल का त्याग करना ही सच्चा स्नान है।’ युधिष्ठिर ने यक्ष के असंख्य प्रश्नों का उत्तर देकर उसे संतुष्ट कर दिया। धर्मराज युधिष्ठिर स्वयं सभी सद्गुणों का पालन करते थे। ऐसे अनेक प्रसंग आए, जब वह धर्म के आदेशों पर अटल रहे। अनेक कठिनाइयां सहन करने के बाद भी उन्होंने धर्म का मार्ग नहीं छोड़ा। 

सहनशीलता

 भगिनी निवेदिता धर्म, अध्यात्म तथा भारतीय संस्कृति से प्रभावित होकर अपना देश व परिवार छोड़कर भारत आईं। स्वामी विवेकानंद के प्रवचनों ने उन्हें इसके लिए प्रेरित किया था। एक दिन उन्होंने देखा कि स्वामी विवेकानंद किसी जिज्ञासु के प्रश्न का उत्तर देते हुए कह रहे थे कि बेसहारा अनाथ बच्चे साक्षात भगवान के समान हैं। दरिद्रनारायण की सेवा भगवान की सेवा है। भगिनी निवेदिता ने उसी समय संकल्प ले लिया कि वह बंगाल में अनाथ बालक-बालिकाओं के कल्याण के लिए एक आश्रम की स्थापना करेंगी। भगिनी निवेदिता कोलकाता के धनाढ्यों के पास पहुंचकर आश्रम के लिए दान मांगने लगीं। एक दिन वह किसी ऐसे सेठ के पास जा पहुंची,
जो अत्यंत कंजूस था। उसने विदेशी गोरी युवती को दान मांगते देखा, तो कहा, ‘मैंने मेहनत से एक-एक पैसा जोड़ा है। आश्रम-वाश्रम में दान क्यों दूं?’ फिर भी, निवेदिता बार-बार कुछ देने का आग्रह करती रहीं। बार-बार मांगने से सेठ आपा खो बैठा और उसने भगिनी निवेदिता को थप्पड़ जड़ दिया। थप्पड़ खाकर भी उस युवती ने धैर्य के साथ कहा, ‘आपने मुझे थप्पड़ दिया, इसे मैं स्वीकार करती हूं। अब अनाथ बच्चों के लिए भी तो कुछ दीजिए।’ सेठ भगिनी निवेदिता की सहनशीलता और समर्पण देख अपने कृत्य पर पछताने लगा। उसने आलमारी से रकम निकालकर उन्हें भेंट कर दी। साथ ही अपने व्यवहार के लिए उनसे क्षमा भी मांगी। 

सेवा-सफाई

 महाराष्ट्र के प्रख्यात संत गाड़गे महाराज सेवा कार्य के लिए सदैव तत्पर रहा करते थे। अपने शिष्यों से वह अकसर कहा करते थे कि तीर्थयात्रा का असली पुण्य उन्हें लगता है, जो तीर्थस्थलों की गंदगी दूर करते हैं। तीर्थयात्रियों की सेवा करते हैं। गाड़गे महाराज किसी तीर्थस्थल में पहुंचते, तो वहां झाड़ू से स्वयं सफाई करने लगते। मंदिरों की सीढ़ियां साफ करने में उन्हें अत्यंत संतोष मिलता था। वर्ष 1907 की बात है। गाड़गे महाराज अमरावती के समीप ऋणमोचन तीर्थ में लगने वाले मेले में पहुंचे। उन्होंने नदी के किनारे पड़े पत्तलों व अन्य कूड़े को झाड़ू से हटाकर एक ओर कर दिया। नदी के किनारे एक स्थान पर एकत्रित गंदे जल को अपने साथियों के साथ उलीचकर बाहर निकाला और
जमीन खोदकर नदी की धारा वहां तक पहुंचाई। अचानक गाड़गे जी की मां भी स्नान के लिए वहां आ पहुंचीं। उन्होंने पुत्र को सफाई करते देखा, तो बोलीं, ‘यह काम तो सफाईकर्मी का होता है। तुम क्यों कर रहे हो?’ गाड़गे ने विनयपूर्वक कहा, ‘मां, श्रद्धालुओं की सेवा व पवित्र तीर्थ की सफाई भी भगवान की पूजा-उपासना ही है। मानव भगवान का ही तो रूप है।’ बेटे के श्रद्धा भरे वचन सुनकर मां गद्गद् हो उठी। गाड़गे महाराज ने गांव-गांव पहुंचकर लोगों को मांस-मदिरा का उपयोग न करने तथा सफाई रखने का संकल्प दिलाया। 

परख

आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती वर्ष 1872 में धर्म प्रचार के लिए कोलकाता पहुंचे। प्रसिद्ध समाजसेवी व विद्वान केशवचंद्र सेन वहां ब्रह्म समाज के प्रचार-प्रसार में जुटे थे। उन्होंने स्वामी जी की ख्याति सुन रखी थी। स्वामी जी भी केशवचंद्र सेन के विचारों से सुपरिचित थे। एक दिन अचानक श्री सेन स्वामी जी से मिलने जा पहुंचे। बिना परिचय दिए ही उन्होंने वार्ता शुरू कर दी। कुछ देर बाद उन्होंने स्वामी जी से पूछा, ‘कोलकाता आने के बाद क्या केशवचंद्र सेन से मिले।’ स्वामी जी उनकी बातचीत से समझ गए थे कि वही केशवचंद्र हैं। वह बोले, ‘आज ही अभी-अभी मिला हूं। मेरे सामने बैठे हैं वह।’ केशवचंद्र सेन ने पूछा, ‘आपने कैसे पहचान लिया?’ स्वामी जी ने जवाब दिया, ‘विचार व्यक्त करते समय ही मैं समझ गया कि आप कौन हैं।’ केशवचंद्र सेन ने जिज्ञासा व्यक्त की, ‘वेद को आप ईश्वरीय ज्ञान कैसे मानते हैं?’ स्वामी जी ने कहा, ‘असली ज्ञान तार्किक होता है। वेदों में कोई चमत्कारिक घटना नहीं है। वे मानव मात्र के कल्याण का साधन बताते हैं। इसलिए वेद ज्ञान सर्वश्रेष्ठ हैं।’ केशवचंद्र उनके ज्ञान से प्रभावित होकर बोले, ‘यदि आप अंगरेजी जानते, तो मैं आपको अपने साथ धर्म-प्रचार के लिए इंग्लैंड ले जाता।’ स्वामी जी ने कहा, ‘यदि आप अंगरेजी के साथ-साथ संस्कृत जानते, तो आप यहां के लोगों को अपनी बात अच्छे ढंग से समझा सकते थे।’ यह सुनकर सेन मुस्करा उठे। धार्मिक विषयों में मतभेद के बावजूद समाज सुधार के क्षेत्र में दोनों का सहयोग बना रहा। 

वरदान

राज्यवर्द्धन परम धर्मात्मा तथा प्रजाहितैषी राजा थे। एक दिन रानी मानिनी उनके सिर में तेल लगा रही थीं कि अचानक उन्हें कुछ सफेद बाल दिखे। रानी चिंतित हो उठीं। राजा को जब पत्नी की चिंता का कारण पता चला, तो वह बोले, ‘जन्म लेने के बाद सभी जवान होते हैं और उन्हें बूढ़ा भी होना पड़ता है। इसलिए चिंता कैसी?’ फिर एक दिन राजा ने घोषणा की, ‘हमने पूर्ण धर्मानुसार जीवन बिताया है। प्रजा की सेवा में कोई कसर नहीं रखी। अब बुढ़ापे ने अपनी झलक दिखाकर हमें वन में जाकर साधना करने की प्रेरणा दी है।राजा प्रजा में बहुत लोकप्रिय थे। उनका यह निर्णय सुनकर सभी चिंतित हो उठे। सबने राजा से वन जाने का आग्रह किया, पर वह तैयार नहीं हुए। तब गंधर्व सुदाम ने सुझाव दिया कि भगवान भास्कर को प्रसन्न किया जाए। वह राजा को सैकड़ों वर्षों तक स्वस्थ बने रहने का वरदान दे सकते हैं। राज्य के अनेक लोगों ने कामरूप पर्वत पर जाकर तप शुरू कर दिया। घोर तप के बाद भगवान भास्कर ने दर्शन दिए और सभी से वर मांगने को कहा। प्रजाजनों ने कहा, ‘हमारे राजा को एक हजार वर्ष तक रोग हो और बुढ़ापा उनसे दूर रहे।भगवान भास्कर ने तथास्तु कह दिया। राज्यवर्द्धन को जब यह बताया गया, तो वह बोले, ‘तब तक तो रानी समेत कोई प्रियजन जीवित नहीं रहेगा। भला मैं अकेला जीवित रहकर क्या करूंगा?’ भगवान भास्कर राजा की इस भावना से बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने राजा के बंधु-बांधवों तथा प्रजा को भी दीर्घायु होने का वरदान दिया। 

उपहार

संत जेरोम जैसा उपदेश देते थे वैसा ही आचरण भी करते थे  कथनी और करनी में कोई भेद नहीं था। वह सादगी, सरलता और सात्विकता की साक्षात मूर्ति थे। जेरोम प्रतिदिन अपने हाथों से किसी-न-किसी असहाय-अनाथ व्यक्ति की सेवा अवश्य करते। इतना करने के बावजूद वह हमेशा कहा करते थे, मैं संसार का सबसे बड़ा पापी हूं। जाने-अनजाने अनेक पाप मुझसे होते हैं। ईसा मसीह उनकी इस सरलता से बहुत प्रभावित थे। एक बार क्रिसमस की रात अचानक संत जेरोम की भेंट ईसा मसीह से हो गई। यीशु ने कहा, ‘आज मेरा जन्मदिन है। क्या जन्मदिन का उपहार नहीं दोगे?’ संत जेरोम ने कहा, ‘मेरे पास देने को क्या है भला। मैं अपना हृदय आपको भेंट कर सकता हूं।’ यीशु ने कहा, ‘मुझे आपका हृदय नहीं, कुछ और चाहिए।’ संत ने कहा, ‘वैसे तो, मैं अपना पूरा शरीर आपको भेंट कर सकता हूं। पर मैं पापी हूं। यदि मेरे खजाने में पुण्य होते, तो मैं उन्हें आपको जन्मदिन के उपहारस्वरूप जरूर भेंट कर देता।’ यीशु ने कहा, ‘जब आपके खजाने में पाप ही पाप हैं, तो फिर उन्हें ही मुझे उपहार में दे दें। आप अपना कोई अवगुण मुझे दे दें। मैं आपके तमाम पापों का फल भोग लूंगा।’ यीशु की प्रेमभरी वाणी सुनकर संत जेरोम की आंखों से अश्रुधारा बह निकली। यीशु ने उन्हें प्यार से गले लगा लिया। 

उपदेश

कुरुक्षेत्र में खग्रास सूर्यग्रहण लगा था। ब्रज से वसुदेव जी भी वहां पहुंचे। ऋषि गणों के शिविर में उन्होंने शास्त्र प्रवक्ता व्यास जी से अनेक प्रश्न किए। वसुदेव जी ने जिज्ञासावश पूछा, ‘सद्गृहस्थ के लिए कल्याण के सरल साधन कौन-से हैं?’ महर्षि व्यास ने कहा, ‘न्यायपूर्वक अर्जित धन से पूजन-अर्चन तथा यज्ञ करें, इच्छाएं सीमित रखें, परिवार का पालन-पोषण करें और धर्म व सत्य के मार्ग पर अटल रहें- इन नियमों के पालन से स्वतः कल्याण हो जाता है।’ वसुदेव जी ने पूछा, ‘ऋषिवर, इच्छाएं त्यागने के उपाय क्या हैं?’ व्यास जी ने बताया, ‘धनार्जन करें, परंतु धर्मपूर्वक और न्यायपूर्वक  ही। भले ही भूखे रहना पड़े, पर अधर्मपूर्वक  धन कदापि अर्जित न करें। वही धन सार्थक होता है, जो यज्ञ, दानादि व परोपकार में व्यय किया जाता है।’ व्यास जी ने आगे कहा, ‘जब मनुष्य को पौत्र हो जाए, तो उसे गृहस्थ का मोह त्यागकर तपस्या, भजन-पूजन व समाज के ऋण से उऋण होने में लग जाना चाहिए।’ वसुदेव जी ने पूछा, ‘ऋषिवर, मुझे क्या करना चाहिए?’ व्यास जी ने बताया, ‘मधुसूदन ने साक्षात आपके पुत्र के रूप में जन्म लिया है- यह आपके पूर्वजन्मों के पुण्यों का प्रताप है। आप समस्त कर्तव्यों से मुक्त हो चुके हैं। देवऋण से विमुक्त होने के लिए आप प्रतिदिन अग्निहोत्र व पंचयज्ञ करते रहें।’ वसुदेव जी व्यास जी से आशीर्वाद ग्रहण कर कृतकृत्य हो उठे। 

भक्ति में सुख

कुरु का राजकुमार भगवान श्रीकृष्ण का भक्त था। उसने संकल्प लिया कि अपना समस्त जीवन वह वृंदावन में बिताएगा। वृंदावन पहुंचकर यमुना तट पर उसने कुटिया बनाई और पूजा-उपासना करने लगा। एक बार मगध देश के राजा सपरिवार वृंदावन पहुंचे। जब राजा-रानी यमुना स्नान करने जा रहे थे तब वृक्ष के नीचे उपासना में लीन तेजस्वी साधु को देखकर वे रुक गए। साधु की समाधि पूरी होने के बाद मगधराज ने विनम्रतापूर्वक कहा, तपस्वी, मुझे आपके चेहरे के तेज से आभास होता है कि कहीं आप राजकुमार तो नहीं। साधु ने कहा,  भगवान श्रीकृष्ण की पावन लीला-भूमि में न कोई राजकुमार होता है और न राजा। श्रीकृष्ण तो अपने सखा गवालो  को भी गले लगाते थे। इसलिए यहां कुल और जाति का विचार करना अधर्म है।’ राजा  तपस्वी के वचनों से अत्यधिक प्रभावित हुए। उन्होंने अनुरोध किया, ‘आप हमारे साथ चलें। अभी आप युवक हैं। हम आपका विवाह अपने कुल की कन्या से करा देंगे। गृहस्थ आश्रम के सभी सुख आप भोगेंगे। कभी दुखी नहीं रहेंगे।’ साधु ने पूछा, ‘क्या राजा व धनवान को कभी दुख नहीं सताता? क्या राजा व गृहस्थ के परिवार में किसी की अकाल मृत्यु नहीं होती? फिर सुख से रहने की बात कहकर आप मुझे साधना से विरक्त क्यों करना चाहते हैं? श्रीकृष्ण की भक्ति में मुझे अनूठा सुख मिलता है।’ राजा ने युवा साधु को गुरु मान लिया और स्वयं भी राजपाट त्यागकर वृंदावन में रहने लगे। 

सच्चा धर्म

 प्रतिष्ठित विचारक टॉलस्टॉय ने अपनी यूरोप यात्रा के दौरान देखा कि उनके लिखे साहित्य से बड़े-बड़े बुद्धिजीवी प्रभावित हैं। उनकी प्रतिष्ठता चरम पर पहुंच रही है। अपनी आत्मकथा कन्फेशन में उन्होंने लिखा है, ‘प्रतिष्ठा से पुलकित मेरे मन में यह जिज्ञासा पैदा हुई कि कीर्ति, धन, ऐश्वर्य पाकर क्या मानव का जीवन सार्थक हो जाता है? मैं विचार करता कि क्या ये सभी चीजें मृत्यु को रोक सकती हैं? मनुष्य जन्म क्यों लेता है? किसलिए जीता है? उसके जीवन की सार्थकता क्या है? ये प्रश्न मेरे मन-मस्तिष्क को झकझोरते रहते।’ टॉलस्टॉय ने गीता तथा अन्य धर्मग्रंथों का भी अध्ययन किया था। उन्हें अनुभूति होने लगी कि जीवन की सार्थकता कर्म में है। एक किसान मौसम की चिंता किए बिना प्रत्येक दिन खेत में पहुंचता है और शारीरिक श्रम करता है। यदि मौसम प्रतिकूल होने के कारण फसल मनमाफिक नहीं होती है, तब भी वह अपने परिश्रम पर पछतावा नहीं करता। वह बिना घबराए सभी प्रकार के कष्ट सहने की क्षमता रखता है। टॉलस्टॉय ने कर्म को ही मानव का धर्म माना। वह भारतीय संस्कृति के प्रमुख सूत्रों, सत्य, अहिंसा, करुणा की भावना से बहुत प्रभावित रहे। उन्होंने लिखा, ‘केवल भौतिकवाद, सांसारिक सुख-सुविधाओं से मानव-हृदय को पूर्ण संतुष्टि नहीं मिल सकती। दूसरे की सहायता करने व दुख में सहभागी बनने से ही मानव को सच्ची आत्मिक शांति प्राप्त होती है।’